Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 233 of 1416

Read in context
Page 233

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । २०१


एरण्डतैलकी मूर्च्छाविधि।

विकसा मुस्तकं धान्यं त्रिफला वैजयन्तिका ।
ह्रीबेरवनखर्जूरं वटशुंगा निशायुगम् ॥ ५० ॥
नलिका भेषजं देयं केतकी च समं समम् ।
प्रस्थे देयं शाणमितं मूर्च्छने दधि कांजिकम् ॥ ५१ ॥

मंजीठ, नागरमोथा, धनियाँ, हरड, आमला, बहेडा, अरणोके पत्ते, सुगन्धवाला, वनखजूर, वडके अंकुर, हल्दी, दारुहल्दी, नली (सुगन्धद्रव्य), साँठ, केवडेकी जड, दही और काँजी ये सब औषधियाँ मूर्च्छार्क लिय दो माशे लेवे और अण्डीका तैल एक प्रस्थ लेवे। सबको एकत्र मिलाकर पूर्वोक्त विधिसे पकाकर मूर्छित करे ॥ ५० ॥ ५१ ॥

तिलके तैलकी मूर्च्छाविधि ।

कृत्वा तैलं कटाहे दृढतरविमले मन्दमन्दानलैस्त-
त्तैलं निष्फेनभावं गतमिह च यदा शैत्ययुक्तं तदैव ।
मञ्जिष्ठारात्रिलोभ्रैर्जलधरनलकैः सामलैः साक्षपथ्यैः
सूचीपुष्पांघ्रिनीरैरुपहितमथितैर्गन्धयोगं जहाति ॥ ५२ ॥
तैलस्येन्दुकलांशकैकविकसाभागोऽपि मूर्च्छाविधौ
ये चान्ये त्रिफलापयोदरजनीह्रीबेरलोध्रान्विताः ।
सूचीपुष्पवटारोहनलिकास्तस्याश्च पादांशका
दुर्गन्धं विनिहन्ति तैलमरुणं सौरभ्यमाकुर्वते ॥ ५३ ॥

अत्यन्त दृढ और साफ कढावमें तैलको डालकर मन्द २ अग्निसे पकावे । जब पककर तेल झागरहित होजाय तब चूल्हेपरसे उतार लेवे । फिर शीतल हो जानेपर उसमें हल्दीको शीतल जलमें पीसकर छोडे फिर मंजीठको जलमें पीसकर डाले तत्पश्चात् लोध, नागरमोथा, नली (सुगन्धद्रव्य), आमले, बहेडे, हरड, केवडेकी जड और सुगंधवाला इन सब औषधियोंके चूर्णको जलमें पीसकर तैलमें डालदेवे । फिर मूर्च्छाद्रव्योंसे चौगुने तैलमें उससे चौगुना पानी डालकर उसको पकावे । जब पककर कुछेक जल बाकी रहजाय तब उतारकर एक सप्ताह तक उसी प्रकार रक्खा रहनेदेवे । इन हल्दी और मंजीठ आदि पदार्थोंको मूर्च्छाद्रव्य कहते हैं। इनका परिमाण इस प्रकार है—तैलका परिमाण जितना हो मंजीठका परिमाण उसका