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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 232 of 1416

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Page 232

२०० | भैषज्यरत्नावली । | [ तैल-

पदार्थ घृतको मूर्च्छित करनेवाले हैं। यह प्रत्येक एकएक पल परिमाण लेवे। प्रथम एकप्रस्थ गोघृतको मन्दमन्द अग्निसे पकावे। जब पकते पकते घृत झागरहित और शब्दरहित होजाय तब नीचे उतारकर उसमें पहिले हल्दी फिर बिजौरे नींबूका रस पश्चात् अन्य औषधियाँ शीतलजलमें पीसकर डालदेवे। फिर चार प्रस्थ जल डालकर मन्द २ अग्निसे पकाकर एक सप्ताहपर्यन्त रखारहनेदेवे । इस प्रकार मूर्च्छित किया हुआ घृत आमदोषको नष्ट करता है और वीर्यवान् एवं सुखदायक होता है ॥ ४६ ॥

तैलकी साधारणमूर्च्छाविधि ।

कृत्वा तैलं कटाहे दृढतरविमले मन्दमन्दानलैस्त-
स्तैलं निष्फेनभावं गतमिह च यदा शैत्ययुक्तं तदैतत् ॥ ४७॥

पहले एक उत्तम कढावमें मीठी २ अग्निसे तेलको पकावे। जब वह तेल झागरहित होजाय, तब उसको चूल्हेपरसे उतारकर कुछ शीतल होनेपर उसमें जलसे पिंसी हुई हल्दी क्रम २ से थोडी २ डाले। फिर मंजीठको जलमें पीसकर क्रमसे थोडा २ तेलमें डाले। फिर इसी प्रकार अन्यान्य मूर्च्छाद्रव्योंको क्रमसे तेलमें डालताजाय फिर एक सप्ताहतक उसको रखारहनेदे । इस प्रकार साधारणरूपसे तेल मूर्च्छित होता है ॥ ४७ ॥

कटुतैलमूर्च्छाविधि ।

वयःस्थारजनीमुस्तबिल्वदाडिमकेशरैः ।
कृष्णजीरकहीबेरनलिकैः सविभीतकैः ॥ ४८ ॥
एतैः समांशैः प्रस्थे च कर्षमात्रं प्रयोजयेत् ।
अरुणाद् द्विपलं तत्र तोयं चाढकसंमितम् ॥
कटुतैलं पचेत्तेन ह्यामदोषहरं परम् ॥ ४९ ॥

आमला, हल्दी, नागरमोथा, बेलकी छाल, दाडिमकी छाल, नागकेशर, कालाजीरा, सुगन्धवाला, नली (सुगन्धद्रव्य), बहेडा और मंजीठ ये कटुतैल (सरसोंके तैल) के मूर्च्छाद्रव्य हैं। इन सब औषधियोंको एकएक कर्ष प्रमाण और मंजीठ दो पल लेवे। एवं सरसोंका तैल एक प्रस्थ और जल एक आढक लेवे। प्रथम तैलको मन्दमन्द अग्निसे पकावे। जब तैल पककर झागरहित होजाय तब उसमें पहिले हल्दी, फिर मंजीठ, तत्पश्चात् आमले आदि औषधियोंके चूर्णको शीतल जलमें पीसकर डालदेवे। यह तैल आमदोषको नष्ट करता है ॥ ४८ ॥ ४९ ॥