भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context१८६ | भैषज्यरत्नावली । | [ रस-
अभिन्यासं महाघोरं विषमं च त्रिदोषजम् ॥ १ ॥
शीतपूर्वं दाहपूर्वं त्रिदोषं विषमं ज्वरम् ।
प्रलेपकज्वरं घोरमर्द्धनारीश्वरं तथा ॥ २ ॥
प्लीहज्वरं तथा कासं चातुर्थिकविपर्य्ययम् ।
पाण्डुरोगगणान्सर्व्वानग्निमान्द्यं महागदम् ॥
एतान्सर्व्वान्निहन्त्याशु पक्षाद्धैन न संशयः ॥ ३ ॥
ये गोलियाँ अत्यन्त वीर्य्यकी वृद्धि करती हैं एवं साध्य वा असाध्य आठों प्रकारके ज्वर, विविध प्रकारके जलदोषजनित विकार, चिरकालसे उत्पन्न हुए सततादिज्वर, अनेकप्रकारके दोषोंसे उत्पन्न हुआ क्षयरोग, धातुगतज्वर, काम और शोकसे उत्पन्न हुए ज्वर तथा भूत, पिशाच, ग्रह आदिकी बाधासे उत्पन्न हुए ज्वर, अभिघातज्वर, अभिचारज्वर, महाभयंकर अभिन्यासज्वर, त्रिदोषजनित विषमज्वर, शीताधिक्य अथवा दाहाधिक्य त्रिदोषजविषमज्वर तथा प्रलेपक और अर्द्धनारीश्वर ज्वर, प्लीहा-युक्तज्वर, खाँसी, चातुर्थिक विपरीतज्वर, पाण्डुरोग और मन्दाग्नि आदि सम्पूर्ण भयंकर रोगोंको एक सप्ताहमें ही निस्सन्देह दूर करती हैं ॥ ९८–६०३ ॥
शाल्यन्नं तक्रसहित भोजयेद् द्विजसंयुतम् ।
ककारपूर्वकं सर्वं वजनीयं विशेषतः ॥ ४ ॥
मैथुनं वर्जयेत्तावद्यावन्न बलवान्भवेत् ॥
सर्वज्वरहरं श्रेष्ठमनुपानं प्रकल्पयेत् ॥ ५ ॥
इसपर रोगीको तक्रसहित शालिचावलोंका भात भोजन करावे और करेला ककडी आदि समस्त ककारवाचक पदार्थ विशेषरूपसे त्याग देवे और जबतक रोगी अच्छेप्रकारसे बलवान् न होजाय तबतक मैथुन नहीं करना चाहिये। यह रस सर्वप्रकारके ज्वरोंको हरनेके लिये परमश्रेष्ठ औषध है इसपर यथादोषानुसार अनु-पानकी कल्पना करनी चाहिये ॥ ६०४ ॥ ६०५ ॥
बृहज्ज्वरान्तकलोह ।
रसं गन्धं तोलकं च जातीकोषफले तथा ।
हेमभस्म तु पादैकं तोलाद्धं रूप्यलौहकम् ॥ ६ ॥
* बृहज्ज्वरान्तके लोहे तोलकमिति रसादिफलान्तं प्रत्येकं तोलकभागम्, हेमभस्म तु पादैकमिति एकभागापेक्षया पादैकम् ।