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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 217 of 1416

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Page 217

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १८५


वर्षदिनमें आनेवाला ज्वर इत्यादि सर्वप्रकारके ज्वरोंको इस भाँति शीघ्र नष्ट करता है, जैसे-सूर्यका प्रकाश अन्धकारको तत्काल नष्ट कर देता है ॥ ९०-९२ ॥

द्वितीय बृहत्सर्वज्वरहरलोह ।

पारदं गन्धकं शुद्धं ताम्रमभ्रं च माक्षिकम् ।
हिरण्यं तारतालं च कर्षमेक पृथक् पृथक् ॥ ९३ ॥
मृतकान्तं पलं देयं सर्वमेकीकृतं शुभम् ।
वक्ष्यमाणौषधैर्भाव्यं प्रत्येकं दिनसप्तकम् ॥ ९४ ॥
कारवेल्लरसेनापि दशमूलरसेन च ।
पपटस्य कषायेण क्वाथेन त्रैफलेन च ॥ ९५ ॥
गुडूच्याः स्वरसेनापि नागवल्लीरसेन च ।
काकमाचीरसेनैव निर्गुण्ड्याः स्वरसेन च ॥ ९६ ॥
पुनर्नवार्द्रकाम्भोभिर्भावनां परिकल्प्य च ।
द्विरक्तिकाक्रमेणैव वटिकां कारयेद्भिषक ॥ ९७ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, ताँबा, अभ्रक, सोनामाखी, सोना, चाँदी और हरताल ये प्रत्येक एकएक तोला और कान्तलोहभस्म ४ तोल लेवे। सबको एकत्र खरल करके आगे कही हुई प्रत्येक ओषधिके रस या क्वाथमें क्रमसे सात सात दिनतक भावना देवे। करेलेके पत्तोंका रस, दशमूलका क्वाथ, पित्तपापडेका और त्रिफलेका क्वाथ, गिलोयका स्वरस पानोंका रस, मकोयका रस, निर्गुण्डीके पत्तोंका रस, पुनर्नवाका रस और अदरखका रस इनमें क्रमसे अलग अलग सात सात दिनतक भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। फिर एक एक गोली पीपलके चूर्ण और पुराने गुडके साथ रोगियोंको सेवन करावे ॥ ९३-९७ ॥

पिप्पलीगुडसंयुक्ता वटिका वीर्य्यवर्द्धिनी ।
ज्वरमष्टविधं हन्ति साध्यासाध्यमथापि वा ॥ ९८ ॥
विविधं वारिदोषोत्थं चिरकालसमुद्भवम् ।
सततादिज्वरं हन्ति नानादोषोद्भवं तथा ॥ ९९ ॥
क्षयोद्भवं च धातुस्थं कामशोकभवं तथा ।
भूतावेशज्वरं चैव ऋक्षदोषभवं तथा ॥ ६०० ॥
अभिघातज्वरं चैवमभिचारसमुद्भवम् ।