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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 211 of 1416

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Page 211

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १७९


चिरज्वरं पित्तभवं धातुस्थं विषमज्वरम् ।
कासं पञ्चविधं हन्ति कामलां पाण्डुमेव च ॥ ५३ ॥
सर्वलोकहितार्थाय शिवेन कथितः पुरा ।
सर्वतोभद्रनामाऽयं रसः साक्षान्महेश्वरः ॥ ५४ ॥

वैद्य इसकी एकएक गोली प्रतिदिन प्रातःकाल पानके रस, शहद अथवा मिश्रीके साथ सेवन करावे और रोगके अनुसार अनुपान देवे। यह रस मन्दाग्नि, सर्वप्रकारके आमदोष, विषूचिका, पित्त-कफजन्य तथा वात-कफजनित रोग, अफारा, मूत्रकृच्छ्र, संग्रहणी, वमन, अम्लपित्त, शीतपित्त, विशेषकर रक्तपित्त, जीर्णज्वर, पित्तज्वर, धातुस्थ विषमज्वर, पाँचोंप्रकारकी खाँसी, कामला और पाण्डुरोग इन समस्त व्याधियोंको नष्ट करता है। पूर्वकालमें संसारके कल्याणके लिये इस सर्वतोभद्रनामक रसको शिवजीने कहा है। यह साक्षात् महेश्वर है ॥ ५०-५४ ॥

ज्वरारि-अभ्रक ।

अभ्रं ताम्रं रसं गन्धं विषं चेति समं समम् ।
द्विगुणं धूर्त्तबीजं च व्योषं पञ्चगुणं मतम् ॥ ५५ ॥
जलेन वटिकां कुर्याद्यथादोषानुपानतः ।
अभ्रं ज्वरारिनामेदं सर्वज्वरविनाशनम् ॥ ५६ ॥
वातिकं पैत्तिकं चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् ।
विषमाख्यान्द्वन्द्वजांश्च धातुस्थान्विषमज्वरान् ॥ ५७ ॥
प्लीहानं यकृतं गुल्ममग्रमांसं सशोथकम् ।
हिक्कां श्वासं च कासं च मन्दानलमरोचकम् ॥
नाशयेन्नात्र सन्देहो वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ५८ ॥

अभ्रक, ताँबा, पारा, गन्धक और शुद्धवत्सनाभ ये प्रत्येक एक एक भाग धतूरेके बीज २ भाग और त्रिकुटा ५ भाग इन सब ओषधियोंको एकत्र जलके साथ उत्तमप्रकारसे खरलकरके एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। नित्यप्रति एकएक गोली यथादोषानुसार अनुपानके साथ सेवन करे। यह ज्वरारि अभ्रक सम्पूर्ण ज्वरोंको दूर करता है। जैसे—वातज, पित्तज, श्लेष्मज, सान्निपातिक, विषम, द्वन्द्वज और धातुगत विषमज्वर एवं तिल्ली और जिगरके विकार, गुल्म, अग्रमांस, शोथ