भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context१७८ भैषज्यरत्नावली । [ रस-
सान्निपातिक ज्वर एवं अन्यान्य अनेक प्रकारके ज्वर खाँसी, श्वास और क्षय प्रभृति रोगोंको शीघ्र नष्ट करती हैं, बल तथा पुष्टि उत्पन्न करती हैं। इनको सेवन करने-वाला मनुष्य यदि प्रतिदिन सुन्दरस्त्रियोंके साथ रमण करे तो भी वीर्य क्षय नहीं होता और न बल नष्ट होता है। इससे ऊर्ध्वगत कफके विकार, दारुण सन्निपात, कामला, पाण्डु, प्रमेह, रक्तपित्तादिःदुस्तर व्याधियाँ दूर होती हैं। इसको महाराजवटी कहते हैं। ये गोलियाँ राजाओंके सदैव सेवन करने योग्य हैं ॥ ४२-४५ -
सर्वतोभद्ररस।
विशुद्धं गगनं ग्राह्यं द्विकर्षं शुद्धगन्धकम् ।
तोलकं तोलकार्द्धं च हिङ्गुलोत्थरसं तथा ॥ ४६ ॥
कर्पूरं केशरं मांसी तेजपत्रं लवङ्गकम् ।
जातीकोषफलं चैव सूक्ष्मैला करिपिप्पली ॥ ४७ ॥
कुष्ठं तालीशपत्रं च धातकी चोचमुस्तकम् ।
हरीतकी च मरिचं शृङ्गवेरविभीतकम् ॥ ४८ ॥
पिप्पल्यामलकं चैव शाणभागं विचूर्णितम् ।
सर्वमेकीकृतं पिष्ट्वा वटीं कुर्याद् द्विगुञ्जिकाम् ॥ ४९ ॥
शुद्ध अभ्रक २ कर्ष, शुद्ध गन्धक १ तोला, सिंगरफसे निकाला हुआ पारा ६ मासे, एवं कपूर, केशर, जटामांसी, तेजपात, लौंग, जावित्री, जायफल, छोटी इलायची, गजपीपल, कूठ, तालीशपत्र, धायके फूल, दारचीनी, नागरमोथा, हरड, मिरच, सोंठ, बहेडा, पीपल और आमले ये प्रत्येक चार चार माशे लेवे। सबको जलके साथ एकत्र खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ४३-४९ ॥
भक्षयेत्पर्णखण्डेन मधुना सितयाऽपि वा ।
रोगं ज्ञात्वाऽनुपानं च प्रातः कुर्याद्विचक्षणः ॥ ५० ॥
हन्ति मन्दानलान्सर्वानामदोषं विषूचिकाम् ।
पित्तश्लेष्मभवं रोगं वातश्लेष्मभवं तथा ॥ ५१ ॥
आनाहं मूत्रकृच्छ्रं च संग्रहग्रहणीं वमिम् ।
अम्लपित्तं शीतपित्तं रक्तपित्तं विशेषतः ॥ ५२ ॥