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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 181 of 1416

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Page 181

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १४९

शुद्ध पारा, गन्धक, विष और सुहागा इन चारोंको समानभाग लेकर एकत्र खरल करे, जब घुटते घुटते औषधि कज्जलके समान काली होजाय तब उस कज्जलीको मरेहुए काले साँपके मुँहमें भरकर मिट्टीसे मुंहको बन्द करके उसपर कपड़ौती करदेवे। फिर उसको मिट्टीकी हांडामें रखकर उसके नीचे ऊपर खूब नमक भरदेवे और हाँडीका मुँह बन्दकरके इसक सान्धस्थानोंको अच्छे प्रकार बन्दकर चार प्रहरतक तीक्ष्ण अग्नि देवे । स्वाङ्गशीतल होनेपर उसको निकालकर खरलमें डालकरके खूब बारीक कज्जली करलेवे, इस कज्जलीको एक रत्तीपरिमाण लेकर रोगीको नस्य देनेसे उसके वाम अङ्गका ज्वर तत्काल दूर होजाता है, फिर धीरे धीरे दहिने अङ्गका भी ज्वर दूर होकर रोगी पूर्ण आरोग्य होजाता है । यह रस अत्यन्त गोपनीय है, इसलिये इसको बड़े यत्नसे छिपाकर रखना चाहिये । इसको अर्धनारीश्वररस कहते हैं ॥ ६३-६७ ॥

मृतसञ्जीवनरस ।
हिंगूलभागाश्चत्वारो जैपालस्य त्रयो मताः ।
द्वौ भागौ टङ्गणस्यापि भागैकममृतस्य च ॥ ६८ ॥
तत्सर्वं मर्दयेच्छ्लक्ष्णं शुष्कं यामं भिषग्वरः ।
शृङ्गवेराम्बुना मर्द्यं व्योषचित्रकसैन्धवैः ॥ ६९ ॥
यामद्वयमितस्तापं हरत्येव न संशयः ।
घनसारससारेण चन्दनेन विलेपनम् ॥ ३७० ॥
विदध्यात्कांस्यपात्रे च भोजनं रोगिणां भिषक् ।
शाल्यन्नं तक्रसहितं भोजयेदिन्दुसंयुतम् ॥ ७१ ॥

सिंगरफ ४ भाग, जमाल गोटा ३ भाग, सुहागा २ भाग और शुद्ध मीठा तेलिया १ भाग, सबको एकत्र बारीक खरल करके अदरखके रसमें एक प्रहर तक खूब घोटे । फिर सुखाकर उसमेंसे एक एक रत्ती परिमाण लेकर सोंठ, मिरच, पीपल, सेंधानमक इनके चूर्ण और चीतेके क्वाथमें मिलाकर रोगीको सेवन करावे । यह रस दो प्रहरमें ही ज्वरको निस्सन्देह नष्ट कर देता है । इस औषधिको सेवन करनेपर शरीरपर कपूर चन्दनादिका लेप आदि शीतोपचार करने चाहिये । ज्वरके कम होजानेपर वैद्य, रोगीको तक्र और कर्पूरमिश्रित शालिधानोंके चावलोंका भात काँसीके पात्रमें रखकर भोजन करावे ॥ ६८-३७१ ॥

सन्निपाते महाघोरे त्रिदोषे विषमज्वरे ।
आमवाते वातगुल्मे शूले प्लीह्नि जलोदरे ॥ ७२ ॥