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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 174 of 1416

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Page 174

१४२ भैषज्यरत्नावली । [ रस-

दद्यात्कणामाक्षिकाभ्यां कामलाह्वयपाण्डुषु ।
तत्तद्रोगानुपानेन सर्वरोगेषु योजयेत् ।
अयं प्रतापलङ्केशः सन्निपातहरः परः ॥ २६ ॥

यह रस सेवन कराकर रोगीके शरीरपर कपूर, चन्दन आदि शीतलपदार्थोंका बारम्बार लेप करे और जुही, मोतिया, चमेली, पुन्नाग और मौलसिरीके फूलोंकी शय्या बनाकर उसपर रोगीको शयन करावे तथा रोगी, हावभाव विलास चञ्चलकटाक्ष आदिसे युक्त और स्थूल तथा उन्नत कुचोंवाली सुन्दर युवतीके साथ रमण करे। एवं मनोहर वीणाकी झंकारके साथ २ कर्णामृतरूप गायनोंको और पवित्र कथाओंको श्रवण करे, इससे समस्त सन्ताप दूर होजाता है। इस रसको सब प्रकारके वातरोगोंमें सैंधेनमकके चूर्ण और चीतेके क्वाथके साथ देवे तथा कामला पांडु आदि रोगोंमें पीपलके चूर्ण और शहदमें मिलाकर देवे। इसके अतिरिक्त अन्य सब प्रकारके रोगोंमें इस रसको यथारोगानुसार अनुपानोंके साथ प्रयोग करे। यह श्रीप्रतापलंकेश्वररस सन्निपातकोनष्ट करनेकी उत्कृष्ट औषध है ॥२२-२६

कफकेतु ।

टङ्कणं मागधी शंखं वत्सनाभं समं समम् ।
आर्द्रकस्वरसेनाथा दापयेद्भावनात्रयम् ॥ २७ ॥
गुञ्जामात्रं प्रदातव्यमार्द्रकस्वरसैर्युतम् ।
पीनसे श्वासकासे च शिरोरोगे गलग्रहे ॥
कफरोगांन्निहन्त्याशु कफकेतुरयं रसः ॥ २८ ॥

सुहागा, पीपल, शंखभस्म और शुद्ध वत्सनाभविष इन सबको समानभाग लेकर अदरखके रसमें तीनबार भावना देवे, फिर एकएक रत्तीकी गोलियां बना लेवे । उनमेंसे एकएक गोली अदरखके स्वरसके साथ सेवन करावे । यह रस पीनसरोग श्वास, खांसी, शिरके समस्त रोग, गलेके रोग और कफजनित सम्पूर्ण व्याधियोंको शीघ्र दूर करता है ॥ २७ ॥ २८ ॥

अन्य कफकेतु ।

दग्धशंखं त्रिकटुकं टङ्कणं समभागकम् ।
विषं च पञ्चभिस्तुल्यमार्द्रतोयेन मर्दयेत् ॥ २९ ॥
वारत्रयं रक्तिकां च वटीं कुर्याद्विचक्षणः ।
प्रातः सायं च वटिकाद्वयमार्द्रकवारिणा ॥ ३० ॥