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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 155 of 1416

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Page 155

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १२३


माक्षिकं रसगन्धौ च तथा शुद्धा मनःशिला ।
चत्वार्येतानि ताम्रस्य प्रत्येकं तुल्यमेव च ॥ ९ ॥
गरलं चाभ्रतुल्यं स्यात् त्रिकटुश्चाभ्रतुल्यकः ।
एतत्सर्वं समं देयं विषमाख्यं तथैव च ॥ १० ॥
एतत्सर्वस्य द्रव्यस्य द्विगुणं कालकूटकम् ।
मात्स्यमाहिषमायूरघृष्टिपत्तैर्विभावयेत् ॥ ११ ॥
चित्रकस्य द्रवेणैव प्रत्येकं याममात्रकम् ।
सर्षपाभा वटी कार्या शोषयेदातपे ततः ॥ १२ ॥

ताँबेकी भस्म १ तोला, लोहभस्म २ तोले, वङ्गभस्म ३ तोले, अभ्रकभस्म ४ तोले तथा स्वर्णमाक्षिकभस्म १ तोला, एकतोला पारद और एक तोला गन्धककी कज्जली, शुद्ध मैनसिल एक तोला काले साँपका विष ४ तोले, त्रिकुटा ४ तोले इन सबकी बराबर अर्थात् २२ तोले कुचला और इन समस्त औषधियोंसे दुगुना अर्थात् ४४ तोले शुद्ध मीठा तेलिया लेवे सम्पूर्ण औषधियोंको एकत्र पीसकर रोहू मछली, भैंसा, मोर और सूकर इन चारोंके पित्तमें पश्चात् चीतेके रसमें क्रम २ से एक एक प्रहरतक भावना देवे, फिर सरसोंके बराबर गोलियाँ बनाकर धूपमें सुखालवे ॥ ८-२१२ ॥

दापयेद्गुटिकामेकां पयःपेटीरसेन च ।
त्रयोदशे सन्निपाते विषूच्यामतिसारके ॥ १३ ॥
त्रिदोषजे तथा कासे दापयेत्कुशलो भिषक् ।
पयःपेटीशतं दद्याद्भोजनं दधिभक्तकम् ॥ १४ ॥
तथा भर्जितमत्स्यं च लेपनं तिलचन्दनैः ।
रोगी वाञ्छति यद्द्रव्यं तत्सर्वं परिदापयेत् ॥
अघोरनृसिंहो नाम रसानामुत्तमो रसः ॥ १५ ॥

इनमेंसे वैद्यको एक एक गोली नारियलके जलके साथ सेवन करानी चाहिये । ये गोलियाँ तेरह प्रकारके सन्निपातज्वर, विषूचिका, अतिसार और त्रिदोषजनित खाँसी आदि रोगोंमें विशेष उपकार करती हैं । इस रसको सेवन कराकर रोगीको सौ नारियलोंका जल वारंवार पान करावे । दही और भात एवं भुनी मछलीका भोजन करावे और उसके शरीरपर तिल और चन्दन आदिका लेप करावे । रोगीकी