भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| १२२ | भैषज्यरत्नावली । | [ रस- |
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लेवे। इसको पञ्चवक्त्र रस कहते हैं। इसकी मात्रा दो रत्ती परिमाण, अनुपान अदरखका रस। यह रस सन्निपातज्वरको हरनेके लिये अत्युत्तम है ॥ ३ ॥
त्रिदोषनीहारसूर्यरस।
रसेन गन्धं द्विगुणं कृशानुरसैर्विमर्द्याष्टदिनानि घर्मे ।
रसाष्टभागं त्वमृतं च दद्याद् विमर्दयेद्वह्निरसेन किंचित् ॥
पित्तैस्तु सम्भावित एष देयस्त्रिदोषनीहारविनाशसूर्य्यः ॥४॥
शुद्धपारा १ भाग और शुद्धगन्धक २ भाग लेकर दोनोंकी एकत्र कज्जली करके चीतेके रसमें ९ दिनतक घोटे, फिर धूपमें सुखावे। इसके पश्चात् उसमें पारेसे अष्टमांश शुद्ध मीठा तेलिया मिलाकर चीतेके थोड़े रसमें खरलकरके उक्त पाँचों पित्तोंकी भावना देवे तो यह रस सिद्ध होता है। यह रस सन्निपातरूप कुहरेको विनाश करनेके लिये सूर्यके समान है॥ ४ ॥
सन्निपातसूर्यरस।
हिङ्गुलं गन्धक ताम्रं मरिचं पिप्पली विषम् ।
शुण्ठी कनकबीजं च श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ॥ ५ ॥
विजयापत्रतोयेन त्रिदिनं भावयेत्सुधीः ।
द्विगुञ्जं पर्णखण्डेन चार्कक्वाथं पिबेदनु ॥ ६ ॥
निहन्ति सन्निपातोत्थान् गदान्घोरान्सुदारुणान् ।
वातिकं पैत्तिकं चैव श्लैष्मिकं च विशेषतः ॥ ७ ॥
सिंगरफ, गन्धक, ताँबा, मिरच, पिपल, वत्सनाभ, सोंठ और धतूरेके बीज इन ओषधियोंको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे। फिर उस चूर्णको भाँगके पत्तोंके रसमें तीन दिनतक भावना देवे। इस रसको दो दो रत्ती परिमाण पानमें रखकर भक्षण करे और ऊपरसे आकके क्वाथका अनुपान करे। यह रस अत्यन्त दारुण और घोर सन्निपातज्वर, विशेषकर वातज, पित्तज और श्लैष्मिक ज्वरोंको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ५–७ ॥
अघोरनृसिंहरस।
भागैकं मृतताम्रस्य द्विभागं मृतलौहकम् ।
त्रिभागं मृतवङ्गं च चतुर्भागं मृताभ्रकम् ॥ ८ ॥