भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context१२८० भैषज्यरत्नावली। [सूतिकारोग-
सौंफ, रायसन, पोहकरमूल, वंशलोचन, देवदारु, सोया, कचूर, बालछड, वच, मोच-
रस, दारचीनी, नागकेशर, जीवंती, मेथी, मुलहठी, दोनों चन्दन, वायविडङ्ग,
सुगन्धवाला, अडूसेकी छाल, धनियाँ, कायफल और नागरमोथा, ये प्रत्येक
औषधि दो दो कर्ष लेकर सबको एकत्र कूट पीसकर बारीक चूर्णकर कपडेसे छान
ले फिर समस्त चूर्णसे दुगुनी मिश्री लेवे। सबको मिलाकर एकमएक करके लड्डू
बनालेवे और शुद्ध पात्रमें भरकर रखदेवे। पश्चात् प्रतिदिन प्रातःकाल गुरु और
देवताओंको यथाविधि पूजकर अपनी जठराग्निके बलानुसार मात्राका निरूपण
करके इस औषधिको शहदके साथ भक्षण करे ॥ ३८–४५ ॥
तद्वर्ण्यं बल्यमायुष्यं वलीपलितनाशनम् ।
वयसः स्थापनं प्रोक्तमग्निदीप्तिकरं परम् ॥ ४६ ॥
वृष्याणामतिवृष्यं च रसायनमिदं शुभम् ।
विशेषात्स्त्रीगदे प्रोक्तं प्रसूतानां यथामृतम् ॥ ४७ ॥
यह औषधि बल, वर्ण और आयुको बढ़ाती है और वली तथा पलित-
रोगका नाश करती है। एवं आयुको स्थापन करनेवाली अग्निको अत्यन्त दीपन
करनेवाली, पुष्टिकर योगोंमें विशेष पुष्टिकर और उत्तम रसायन है। विशेष-
कर स्त्रियोंके रोगोंमें इसको प्रयोग करे, प्रसूता स्त्रियोंके लिये तो यह अमृतके
समान है ॥ ४६ ॥ ४७ ॥
विंशतिर्व्यापदो योनेः प्रदरं पञ्चधाऽपि च ॥ ४८ ॥
योनिदोषहरं स्त्रीणां रजोदोषहरं तथा ।
पापसंसर्गजं दोषं नाशयेन्नात्र संशयः ॥ ४९ ॥
आमवातहरं चैव शिरःशूलनिवारणम् ।
सर्वशूलहरं चैव विशेषात्कटिशूलनुत ॥ ५० ॥
वीर्यवृद्धिकरं पुंसां सूतिकातङ्कनाशनम् ॥ ।
वातपित्तकफोत्पन्नान्द्वन्द्वजान्सन्निपातजान् ॥ ५१ ॥
हन्ति सर्वगदानेषा शुण्ठी सौभाग्यदायिनी ।
सौभाग्यदायिनी स्त्रीणामतः सौभाग्यशुण्ठिका ॥५२॥
यह बीस प्रकारके योनिरोग, ५ प्रकारके प्रदर, रजोदोष, पापदोषजन्य
रोग, आमवात, शिरःशूल, कटिशूल, एवं अन्यान्य सर्वप्रकारके शूलरोगोंको