भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
Public domain in India · Report a copyright issue
Page 1311 of 1416
Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२७९
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर एक गोली भक्षण करे और ऊपरसे बकरीका दूध पीवे तो इससे आमवात, खाँसी, श्वास, पीनस, संग्रहणी, अम्लपित्त, रक्तपित्त, व्रण, क्षय और बीसप्रकारके स्त्रीरोग सेवन करतेही नष्ट होते हैं और प्रतिदिन स्त्रियोंके स्तन दृढतर होते हैं। यह सौभाग्यशुण्ठी योग्यस्त्रियोंके सुहागको बढानेवाली, पुष्टि देनेवाली और धातुवृद्धि करनेवाली है ॥ ३६-३७ ॥
बृहत्सौभाग्यशुण्ठी ।
वृहच्छुण्ठीं समादाय चूर्णयित्वा विधानतः ।
पलषोडशिकां नीत्वा क्षीरे दशगुणे पचेत् ॥ ३८ ॥
क्रमेण पाकशुद्धिः स्याद् घृतप्रस्थे च भर्जयेत् ।
लघुपाकः प्रकर्त्तव्यो न खरो मोदकेष्वपि ॥ ३९ ॥
शतावरी विदारी च मुसली गोक्षुरो बला ।
छिन्नासत्त्वं शताह्वा च जीरके व्योषचित्रकौ ॥ ४० ॥
त्रिसुगन्धि यमानी च तालीशं कारवी मिसिः ।
रास्ना पुष्करमूलं च वंशी दारु शताह्वयम् ॥ ४१ ॥
शठी मांसी वचा मोचा त्वक् पत्रं नागकेशरम् ।
जीवन्ती मेथिका यष्टिश्चन्दनं रक्तचन्दनम् ॥ ४२ ॥
कृमिघ्नं तोयसिंहास्यधान्याकं कट्फलं घनम् ।
कर्षद्वयमितं भागं प्रत्येकं पट्टघर्षितम् ॥ ४३ ॥
सर्वचूर्णाद्द्विगुणिता प्रदेया सितशर्करा ।
युक्त्या पाकविधानज्ञो मोदकान् परिकल्पयेत् ॥ ४४ ॥
शुद्धे भाण्डे निधायाथ खादेन्नित्यं यथाबलम् ।
वीक्ष्याग्निबलकोष्ठं च नारीणां च विशेषतः ॥
क्षौद्रानुपानतः प्रातर्गुरुदेवान् समर्च्य च ॥ ४५ ॥
बडी बडी सोंठकी गाँठोंको १६ पल लेकर चूर्ण करके दसगुने दूधमें पकावे। जब पकते पकते पाक गाढा पडजाय तब उसको २ प्रस्थ घीके साथ मन्द-मन्द अग्निसे शनैः शनैः भूने। फिर उसकी तरल अवस्थामें ही उसमें शतावर, विदारीकन्द, मुसली, गोखुरू, खिरैंटी, गिलोयका सत्त्व, सोया, छोटाजीरा, बडा जीरा, त्रिकुटा, चीता, छोटी इलायची, दारचीनी, तेजपात, अजवायन, तालीशपत्र, कालाजीरा,