भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहितं । १२७७
संग्रहग्रहणीं हन्ति सूतिकां च सुदुस्तराम् ।
वह्निं च कुरुते दीप्तं शूलानाहविबन्धनुत् ॥ २५ ॥
प्रसारणीको १०० पल लेकर ३२ सेर जलमें पकावे। जब चतुर्थांश शेष रह-जाय तब उतारकर छानलेवे। फिर उसमें चीनी ३० पल तथा इन्द्रजौ, धनियाँ, नागरमोथा, खस, बेलगिरी, मोचरस, पीपल, मिरच, खिरेंटी, अतीस, बालछड, सुगन्धवाला और धमासा इनको चार चार तोले ले बारीक चूर्ण करके डालदेवे । फिर मन्दमन्द अग्निसे पकावे । यह अवलेह यथाविधि सेवन करनेसे दुस्तर संग्रहणी, शूल, अफारा और विबन्धआदिसे युक्त सूतिकारोगको नष्ट करता है और अग्निको दीपन करता है ॥ २२–२५ ॥
सौभाग्यशुण्ठी १–२ ।
कशेरुशृङ्गाटविराटमुस्तं द्विजरीरकं जातिफलं सको-
षम्। लवङ्गशैलेयसनागपुष्पं पत्रं वराङ्गं च शठी सधा-
तकी ॥२६॥ एला शताह्वा धनिकेभकृष्णा सपिप्पली
सोषणका सभीरुः । प्रत्येकमेषामिह कर्षयुग्मं लौहं
तथाऽभ्रं पलभागयुक्तम् ॥ २७ ॥ महौषधीचूर्णपलानि
चाष्टौ पलानि त्रिंशत्सितशर्करायाः । फलानि चाष्टा-
वपि सर्पिषश्च प्रस्थद्वयं क्षीरमिह प्रयुक्तम् ॥२८॥॥ पचे-
द्विधिज्ञः परमादरेण खादेदिदं कर्षमथार्द्धकर्षम् । कर्ष-
द्वयं वापि समीक्ष्य शस्तं सौभाग्यशुण्ठी कथिता
भिषग्भिः । अग्निप्रदा सूतिगदापहा च सर्वातिसार-
ग्रहणीहरा च ॥ २९ ॥
१-कसेरु, सिंघाडे, कमलगट्टा, नागरमोथा, जीरा, कालाजीरा, जायफल, जावित्री, लौंग, भूरिछरीला, नागकेशर, तेजपात, दारचीनी, कचूर, धायके फूल, इलायची, सोया, धनियाँ, गजपीपल, पीपल, कालीमिरच और शतावर ये प्रत्येक दो दो तोले एवं लोहा और अभ्रक चार चार तोले, सोंठका चूर्ण ३२ तोले, मिश्री ३० पल, घी ३२ तोले और दूध २ प्रस्थ लेवे । इन सबको यथाविधि एकत्र मिलाकर विधिवेत्ता वैद्य मन्दमन्द अग्निद्वारा प्रेमपूर्वक पाकको सिद्ध करे । इसमेंसे प्रतिदिन १ कर्ष अथवा आधाकर्ष और जठराग्निका बल देखकर आधा कर्ष या