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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1308 of 1416

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Page 1308

१२७६ भैषज्यरत्नावली । [ सूतिकारोग-

निहन्ति सूतिकारोगं वातपित्तकफोद्भवम् ।
कषायो देवदार्वादिः सूतायाः परमौषधम् ॥ १७ ॥
यह देवदार्वादिक्वाथ शूल, खाँसी, ज्वर, श्वास, मूर्च्छा, कम्प, शिरोरोग, प्रलाप, तृषा, दाह, तन्द्रा, अतीसार, वमन आदि रोगोंसे युक्त वात पित्त कफजन्य सूतिका-रोगको नष्ट करता है। यह प्रसूताकी उत्कृष्ट औषधि है ॥ १६ ॥ १७ ॥

वज्रकाञ्जिक ।

पिप्पली पिप्पलीमूलं चव्यं शुण्ठी यमानिका ।
जीरके द्वे हरिद्रे द्वे विडं सौवर्चलं तथा ॥ १८ ॥
एतैरेवौषधैः पिष्टैरारनालं विपाचयेत् ॥ १९ ॥
पीपल, पीपलामूल, चव्य, सोंठ, अजवायन, जीरा, कालाजीरा, हल्दी, दारु-हल्दी, विरियासञ्चर नमक और काला नमक इन औषधियोंको समान भाग मिश्रित ८ तोले लेकर सबको काँजीके साथ एकत्र पीसकर एकसेर काँजी और २ सेर जलमें पकावे। जब पकते २ काँजीमात्र शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे ॥ १८॥१९॥

एतदामहरं वृष्यं कफघ्नं वह्निदीपनम् ।
काञ्जिकं वज्रकं नाम स्त्रीणामग्निविवर्द्धनम् ॥
मक्कल्लशूलशमनं परं क्षीराभिवर्द्धनम् ॥ २० ॥
“क्षीरपाकविधानेन काञ्जिकस्यापि साधनम् ॥२१॥”
यह वज्रनामक काँजी प्रसूतास्त्रियोंके आम कफजरोगोंको हरती है तथा अत्यन्त पुष्टिकर जठराग्निकी वृद्धि करनेवाली है। इससे मक्कल्लशूल नष्ट होता है और स्तनोंमें अधिकतर दुग्धवृद्धि होती है। “क्षीरपाकविधिके अनुसार इस वज्रकाञ्जिकको भी सिद्ध करना चाहिये” ॥ २० ॥ २१ ॥

भद्रोत्कटाद्यवलेह ।

भद्रोत्कटतुलाक्वाथे पादशेषे विनिक्षिपेत् ।
शर्करायाः पलत्रिंशच्चूर्णानीमानि दापयेत् ॥ २२ ॥
वत्सकं धान्यकं मुस्तमुशीरं बिल्वमेव च ।
शाल्मलीवेष्टकं चैव पिप्पली मरिचानि च ॥ २३ ॥
बला चातिविषा मांसी ह्रीबेरं सदुरालभम् ।
एषां च पलिकैर्भागैश्चूर्णैरेतत्समाचरेत् ॥ २४ ॥