भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२७३
देखना, अत्यंत मैथुन, परिश्रम करना, बोझ उठाना, बहुत भारी वस्त्र पहरना, रात्रिमें जागना, दिनमें सोना, कठिनस्थानमें अथवा उत्कट रूपसे बैठना, शोक, क्रोध, भय, उद्वेग, मूत्र-मलादिका वेगधारण, इच्छित वस्तुकी अप्राप्ति, व्रत करना, मार्ग चलना, तीक्ष्ण, गरम, भारी और विष्टम्भकारी द्रव्योंका भोजन, रात्रिमें अभोजन, छिद्र देखना, कुएँमें झाँकना, मद्य पीना, मांस खाना, चित्त होकर सोना ये सब और जो स्त्रियोंको अप्रिय हों उन सब वस्तुओंको गर्भिणी स्त्रियें त्यागदेवें ॥ ९१-९४ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां गर्भिणीरोगचिकित्सा ॥
सूतिकारोगकी चिकित्सा ।
सूतिका रोगशान्त्यर्थं कुर्याद्वातहरीं क्रियाम् ।
दशमूलकृतक्वाथं कोष्णं दद्याद् घृतान्वितम् ॥ १ ॥
सूतिका रोगको शान्त करनेके लिये वातनाशक चिकित्सा करे और दशमूलकें मन्दोष्ण क्वाथको घृत मिलाकर प्रसूताके लिये देवे ॥ १ ॥
सूताया हृच्छिरोवस्तिशूलं मक्कल्लसंज्ञितम् ।
यवक्षारं पिबेत्तत्र सर्पिषोष्णोदकेन वा ॥
पिप्पल्यादिगणक्वाथं पिबेद्वा लवणान्वितम् ॥ २ ॥
प्रसूतास्त्रीके हृदय, शिर और वस्तिस्थानमें जो शूल उत्पन्न होता है उसको मक्कल्लशूल कहते हैं । इस रोगमें जवाखारको घी या गरम जलके साथ अथवा पिप्पल्यादिगणकी औषधियोंके क्वाथको सैंधानोन मिलाकर पान करे ॥ २ ॥
पारावतशकृत्पीतं शालितण्डुलवारिणा ।
गर्भपातानन्तरोत्थरक्तस्रावनिवारणम् ॥ ३ ॥
कबूतरकी बीठको शालिचावलोंके जलके साथ पान करनेसे गर्भपातके पीछे उत्पन्न हुआ रक्तस्राव दूर होता है ॥ ३ ॥
जलपिष्टवरुणपत्रैः सघृतैरुद्वर्त्तनालेपौ ।
किक्किशरोगं हरतो गोमयघर्षादथो विहितौ ॥ ४ ॥
वरनाके पत्तोंको जलमें पीसकर उनमें घृत मिलाकर मालिश, लेप अथवा गोबरके साथ घिसनेसे किक्किशरोग नष्ट होता है ॥ ४ ॥