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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1304 of 1416

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Page 1304
१२७२भैषज्यरत्नावली ।[ गर्भिणीरोग-

कुडकी छाल इन सबके क्वाथमें यथाक्रम भावना देकर मटरकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । इस रसको दोषोंके अनुसार अनुपान कल्पितकर गर्भिणीके रोगोंमें प्रयोग करे । यह गर्भवती स्त्रियोंके ज्वर, घोरतर श्वास, खाँसी, शिरोरोग, रक्तातीसार, संग्रहणी, वमन, अग्निकी मन्दता, आलस्य, दुर्बलता आदि विकारोंको निस्सन्देह नष्ट करता है । इस रसको कलियुगके आदिमें कलियुगी स्त्रियोंकी रक्षाके लिये चन्द्रमौलि भगवान् शङ्करने बनाया है ॥ ८२-८६ ॥

गर्भिणीरोगमें पथ्य ।

शालयः षष्टिका मुद्गा गोधूमा लाजसक्तवः ।
नवनीतं घृतं क्षीरं रसाला मधु शर्करा ॥ ८७ ॥
पनसं कदलं धात्री द्राक्षाऽऽम्रं स्वादु शीतलम् ।
कस्तूरी चन्दनं माल्यं कर्पूरमनुलेपनम् ॥ ८८ ॥
चन्द्रिका स्नानमभ्यङ्गो मृदुशय्या हिमानिलः ।
सन्तर्पणं प्रिया वाचो विहाराश्च मनोरमाः ॥ ८९ ॥
प्रियङ्करं चान्नपानं गर्भिणीभ्यो हितं भवेत् ॥ ९० ॥

शालिधानोंके और सांठीके चावल, मूँग, गेहूँ, खीलोंके सत्तू, नैनीघी, घी, दूध, रसाला, शहद, चीनी, कटहल, केला, आमले, दाख, आम, मीठे और शीतल पदार्थ, कस्तूरी, चंदन, फूलमाला, कपूरका लेप, चाँदनी, स्नान, अभ्यंजन, कोमल-शय्या, शीतलवायु, संतर्पण, प्रियवाक्य, मनोहरविहार और रुचिकर अन्नपान ये सब वस्तुएँ गर्भवती स्त्रियोंके लिये हितकारी हैं ॥८७-९०॥

गर्भिणीरोगमें अपथ्य ।

स्वेदनं वमनं क्षारं कलहं विषमाशनम् ।
असात्म्यं नक्तसञ्चारं चौर्यं चाप्रियदर्शनम् ॥ ९१ ॥
अतिव्यवायमायासं भारं प्रावरणं गुरु ।
अकालजागरस्वप्नकठिनोत्कटकासनम् ॥ ९२ ॥
शोकक्रोधभयोद्वेगवेगश्रद्धाविधारणम् ।
उपवासाध्वतीक्ष्णोष्णगुरुविष्टम्भिभोजनम् ॥ ९३ ॥
नक्तं निरशनं श्वभ्रकूपेक्षां मद्यमामिषम् ।
उत्तानशयनं यच्च स्त्रियो नेच्छन्ति तत्त्यजेत् ॥ ९४ ॥

स्वेदप्रदान, वमन करना, खारीपदार्थोंका सेवन, वाद विवाद, विषम-भोजन, असात्म्यद्रव्योंका सेवन, रात्रिमें टहलना, चोरीकरना, अप्रिय वस्तुके