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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 1280

१२४८ | भैषज्यरत्नावली । | [ योनिव्यापद्-


प्राप्त होती हैं और गर्भको शीघ्र धारण करती हैं। यह फलघृत अल्पकालमेंही सर्वप्रकारके योनिके दोषोंको हरण करता है ॥ ४१ ॥ ४२ ॥

फलकल्याणघृत ।

मञ्जिष्ठा मधुकं कुष्ठं त्रिफला शर्करा बला ।
मेदा पयस्या काकोली मूलं चैवाश्वगन्धजम् ॥ ४३ ॥
अजमोदा हरिद्रे द्वे हिङ्गुः कटुकरोहिणी ।
उत्पलं कुमुदं द्राक्षा काकोल्यौ चन्दनद्वयम् ॥ ४४ ॥
एतेषां कार्षिकैर्भागैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
शतावरीरसं क्षीरं घृताद्देयं चतुर्गुणम् ॥ ४५ ॥

मंजीठ, मुलहठी, कूट, त्रिफला, चीनी, खिरेंटी, मेदा, क्षीरकाकोली, काकोली, असगन्धकी जड, अजमोद, हल्दी, दारुहल्दी, हींग, कुटकी, लालकमल, बबुला, दाख, क्षीरकाकोली, काकोली, श्वेतचंदन, रक्तचन्दन और लक्ष्मणाकी जड अभावमें सफेद कटेरीकी जड ) इन सब औषधियोंको दो दो तोले लेकर एकत्र कूट पीसकर चूर्ण करलेवे । फिर घी १ प्रस्थ, शतावरका रस और दूध ४-४ प्रस्थ लेवे, सबको यथाविधि मिलाकर उत्तम प्रकार घृतको सिद्ध करे ॥४३-४५॥

सर्पिरेतन्नरः पीत्वा नित्यं स्त्रीषु वृषायते ।
पुत्रान्संजनयेन्नारी मेधाढ्यान्प्रियदर्शनान् ॥ ४६ ॥
या चैवास्थिरगर्भा स्याद्या च वा जनयेन्मृतम् ।
अल्पायुषं वा जनयेद्या च कन्यां प्रसूयते ॥ ४७ ॥
योनिदोषे रजोदोषे परिस्रावे च शस्यते ।
प्रजावर्द्धनमायुष्यं सर्वग्रहनिवारणम् ॥ ४८ ॥
नाम्ना फलघृतं ह्येतदश्विभ्यां परिकीर्तितम् ॥ ४९ ॥
“अनुक्तं लक्ष्मणामूलं क्षिपन्त्यत्र चिकित्सकाः ।
जीवद्वत्सैकवर्णाया घृतमत्र तु गृह्यते ॥
आरण्यगोमयेनापि वह्निज्वाला प्रदीयते ॥ ५० ॥”

पुरुष इस घृतको पान करके प्रतिदिन स्त्रियोंमें वृषभके समान रमण करता है और स्त्री इस घृतको पान करे तो मेधावी और प्रियदर्शन पुत्रोंको उत्पन्न करती है। जो स्त्री अस्थिरगर्भा हो और जिसके मृत या अल्पायुवाली संतान