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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1264 of 1416

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Page 1264

१२३२ भैषज्यरत्नावली । [ प्रदररोग


योनिदोषं रजोदोषं श्वेतं नीलं सपीतकम् ।
स्त्रीणां श्यावारुणं यच्च तत्प्रसह्य निवर्त्तयेत् ॥ २७ ॥
चूर्णं पुष्यानुगं नाम हितमात्रेयपूजितम् ।
अम्बष्ठा दक्षिणे ख्याता गृह्णन्त्यन्ये तु लक्षणाः ॥ २८ ॥
अर्श और रक्तातीसारमें इसको प्रयोग करना उपयोगी है। यह चूर्ण बालकोंके जितने भी आगन्तुक रोग हैं उन सबको और स्त्रियोंके योनिदोष, श्वत, नील, पीत, श्याम और अरुण प्रदररोगोंको बहुत शीघ्र नष्ट करता है। यह पुष्यानुगनामक चूर्ण उक्त रोगोंमें विशेष हितकारी है और आत्रेय करके पूजित है ॥ २६-२८॥

उत्पलादि ।

कन्दं रक्तोत्पलस्याथ रक्तकार्पासमुलकम् ।
करवीरस्य मूलानि तथा रक्तोद्रमूलकम् ॥ २९ ॥
बकुलस्य तथा मूलं गन्धमातृकजीरकौ ।
रक्तचन्दनकं चैव समभागं च कारयेत् ॥ ३० ॥
तण्डुलोदकसंविष्टं रक्तमूत्राय दापयेत् ।
योनिशूलं कटीशूलं कुक्षिशूलं च नाशयेत् ॥
योनिशूलहरः प्रोक्त उत्पलादिर्न संशयः ॥ ३१ ॥
लालकमलकी जड, लालकपासकी जड, लालकनेरकी जड, लालगुडहलकी जड, बक वृक्षकी जड, गन्धमात्रा, जीरा और लाल चन्दन इनको बराबर २ लेकर एकत्र कूट पीसकर चूर्ण बनालेवे । इसको चावलोंके पानीमें पीसकर और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे रक्तमूत्र, योनिशूल, योनिशूल, कटिशूल और कुक्षिशूल नाश होता है। यह उत्पलादि चूर्ण योनिशूलको निस्सन्देह नष्ट करता है ॥

मधुकाद्यवलेह ।

मधुकं चन्दनं लाक्षा रक्तोत्पलरसाञ्जनम् ।
कुशवीरणयोर्मूलं बलावासकयोस्तथा ॥ ३२ ॥
कोलमज्जाम्बुदं बिल्वं पिच्छा दार्वा च धातकी ।
अशोकवल्कलं द्राक्षा जवाकुसुममस्फुटम् ॥ ३३ ॥
आम्रजम्बुकिसलयं कोमलं नलिनीदलम् ।
शतमूली विदारी च रजतं लौहमभ्रकम् ॥ ३४ ॥