भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context११९० | भैषज्यरत्नावली । | [ नेत्ररोग-
मिलाकर लगानेसे पिच्चिटरोग और स्त्रीके दूधमें मिलाकर लगानेसे सर्व प्रकारके नेत्ररोग नष्ट होते हैं ॥ ७८ ॥ ७९ ॥
हरिद्रानिम्बपत्राणि पिप्पली मरिचानि च ।
भद्रमुस्तं विडङ्गानि ससमं विश्वभेषजम् ॥ ८० ॥
गोमूत्रेण गुडी कार्या छागमूत्रेण चाञ्जनात् ।
ज्वरांश्च निखिलान्हन्ति भूतावेशं तथैव च ॥ ८१ ॥
वारिणा तिमिरं हन्ति मधुना पटलं तथा
नक्तान्ध्यं भृङ्गराजेन नारीक्षीरेण पुष्पकम् ॥
शिशिरेण परिस्रावमध्रुषं पिच्चिटं तथा ॥ ८२ ॥
हल्दी, नीमके पत्ते, पीपल, मिरच, नागरमोथा, वायविडङ्ग और सोंठ इनको समान भाग लेकर एकत्र गोमूत्रके साथ उत्तम प्रकार खरल करके गोली बनालेवे । इस गोलीको बकरीके मूत्रमें घिसकर लगानेसे सर्व प्रकारके आगन्तुक ज्वर और भूतावेश तथा जलके साथ लगानेसे तिमिररोग, मधुके साथ लगानेसे पटलरोग, भाँगरेके स्वरसके साथ लगानेसे रतौंधा, स्त्रीके दूधके साथ लगानेसे पुष्पकरोग और शीतलजलके साथ मिलाकर लगानेसे परिस्राव, अध्रुष और पिच्चिटरोग नष्ट होते हैं ॥ ८०–८२ ॥
भूमौनिघृष्टयाऽङ्गुल्या अञ्जनं शमनं तयोः ।
तैमिर्यकाचार्महरं धूमिकायाश्च नाशनम् ॥८३॥
पृथ्वीमें अंगुलीको घिसकर फिर अञ्जन लगानेसे तिमिर, काच, अर्म और धूमिकारोगका नाश होता है ॥ ८३ ॥
त्रिफलाभृङ्गमहौषधमध्वाज्यच्छागपयसि गोमूत्रे ।
नागं सप्तनिषिक्तं करोति गरुडोपमं चक्षुः ॥ ८४ ॥
सीसेको अग्निमें तपाकर त्रिफलेके क्वाथ, भाँगरेके स्वरस, सोंठके क्वाथ, शहद, घी, बकरीके दूध और गोमूत्र इनमें क्रमपूर्वक सातवार बुझाकर उसकी सलाई बनालेवे । फिर उस सलाईको पत्थरपर घिसकर अञ्जन लगावे तो इससे गरुडके समान दृष्टिशक्ति अत्यन्त सूक्ष्म होजाती है ॥ ८४ ॥
चिञ्चापत्ररसं निधाय विमले त्वौडुम्बरे भाजने
मलं तत्र निघृष्टसैन्धवयुतं गौअं विशोष्यातपे ।