भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११८९
जो पुरुष पथ्यद्रव्योंका भोजन करता हुआ प्रतिदिन सन्ध्यासमय त्रिफलेके चूर्णको घृत और मधुके साथ मिलाकर भक्षण करे तो वह मनुष्य सम्पूर्ण नेत्र रोगोंसे इस प्रकार मुक्त होता है, जैसे धनहीन मनुष्य सेवकोंसे छूटजाता है ॥ ७३ ॥
सघृतं वा वराक्वाथं शीलयेत्तिमिरमयी ॥
तिमिररोगी निरन्तर घृत डालकर त्रिफलेके क्वाथको पान करे ॥
त्रिफलायाः कषायेण प्रातर्नयनधावनात् ।
जाता रोगा विनश्यन्ति न भवन्ति कदाचन ॥ ७४ ॥
प्रतिदिन प्रातःकालमें त्रिफलेके क्वाथसे नेत्रोंको धोनेसे उत्पन्नहुए नेत्ररोग नष्ट होजाते हैं और फिर नेत्ररोग कभी पैदा नहीं होते हैं ॥ ७४ ॥
जलगण्डूषैः प्रातर्बहुशोऽम्भोभिः प्रपूर्य मुखरन्ध्रम् ।
निर्दयमुक्षन्नक्षि क्षपयति तिमिराणि ना सद्यः ॥ ७५ ॥
प्रातः समय बहुतसे शीतल जलको मुखमें भरकर उस जलके द्वारा निर्दयी बनकर जोर जोरसे रोगीके नेत्रोंपर कुल्ले करे इस प्रकार करनेसे तिमिररोग बहुत जल्द नष्ट होता है ॥ ७५ ॥
भुक्त्वा पाणितलं घृष्ट्वा चक्षुषोर्दीयते यदि ।
अचिरेणैव तद्वारि तिमिराणि व्यपोहति ॥ ७६ ॥
भोजन करनेके बाद हाथकी हथेलीको जलसे घिसकर नेत्रोंमें बारम्बार लगावे तो शीघ्रही वह जल तिमिररोगको नष्ट करता है ॥ ७६ ॥
पत्रगैरिककर्पूरयष्टीनीलोत्पलाञ्जनम् ।
नागकेशरसंयुक्तमशेषतिमिरापहम् ॥ ७७ ॥
तेजपात, गेरू, कपूर, मुलहठी, नील कमल, रसौत और नागकेशर इनको समान भाग लेकर एकत्र कूटपीसकर आँखोंमें आँजनेसे समस्त तिमिररोग नष्ट होते हैं ॥
शंखस्य भागाश्चत्वारस्तदर्द्धेन मनः शिला ।
मनःशिलाद्धैं मरिचं मरिचार्द्धेन पिप्पली ॥ ७८ ॥
वारिणा तिमिरं हन्ति अर्बुदं हन्ति मस्तुना ।
पिच्चिटं मधुना हन्ति स्त्रीक्षीरेण तदुत्तमम् ॥ ७९ ॥
शंख चार भाग, मैनासिल दो भाग, मिरच एक भाग और सेंधानमक आधा भाग इनको एकत्र कूट पीस छानकर अञ्जन बनालेवे । इस अञ्जनको जलके साथ मिलाकर लगानेसे तिमिररोग, दहीके तोडके साथ लगानेसे अर्बुदरोग, शहदमें