भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context११३८ भैषज्यरत्नावली । [ क्षुद्ररोग-
भल्लातकबृहतीफलगुञ्जामूलफलेभ्यस्त्वैकेन ।
मधुसहितेन विलिप्तं सुरपतिलुप्तं शमं याति ॥ ७३ ॥
भिलावे, बडीकटेरीके फल, चोंटली और चोंटलीकी जड इनमेंसे किसीएकको शहदके साथ मर्दनकर लेप करे तो इन्द्रलुप्तरोग शमन होता है ॥ ७३ ॥
बृहतीफलरसपिष्टं गुञ्जाफलमिन्द्रलुप्तस्य ।
कनकफलनिघृष्टस्य सतोयं दातव्यं प्रच्छितस्य सदा॥७४
पकीहुई बडी कटेरीके फलके रसमें चोंटलीको अथवा चोंटलीकी जडको पीसकर शिरावेध कियेहुए इन्द्रलुप्तवाले स्थानपर धतूरेके फल अथवा गूलर आदिके कडे पत्तोंसे घर्षण करके लेप करना चाहिये ॥ ७४ ॥
घृष्टस्य कर्कशैः पत्रैरिन्द्रलुप्तस्य गुण्डनम् ।
चूर्णितैर्मरिचैः कार्यमिन्द्रलुप्तविनाशनम् ॥ ७५ ॥
इन्द्रलुप्तके स्थानको गूलर आदिके कर्रें पत्तोंसे घिसकर उसपर काली मिरचोंके चूर्णको बुरकादेनेसे इन्द्रलुप्तरोग नष्ट होता है ॥ ७५ ॥
छागक्षीररसाञ्जनपुटदग्धगजदन्तमसीलिप्ताः ।
जायन्ते सप्तदिनात्खल्वामपि कुञ्चिताश्चिकुराः ॥ ७६ ॥
रसौंत और पुटपाक द्वारा भस्म कीहुई हाथीदाँतकी स्याही, इन दोनोंको बकरीके दूधमें पीसकर लेप करे तो सात दिनमें इन्द्रलुप्त नष्ट होकर बाल निकल आते हैं ॥ ७६ ॥
मधुकेन्दीवरमूर्वातिलाज्यगोक्षीरभृङ्गलेपेन ।
अचिराद्भवन्ति केशा घनदृढमूलायतानृजवः ॥ ७७ ॥
मुलेठी, नीलकमल, मूर्वा, कालेतिल और भाँगरा इनको गौके दूधमें पीसकर घीमें मिलाकर लेप करनेसे घने, मजबूत और घुंघुरवाले बाल बहुत शीघ्र उत्पन्न होते हैं ॥ ७७ ॥
केशरञ्जनयोग ।
त्रिफला नीलिनीपत्रं लौहं भृङ्गरजः समम् ।
अविमूत्रेण संयुक्तं कृष्णीकरणमुत्तमम् ॥ ७८ ॥
हरड, बहेडा, आमला, नीलवृक्षके पत्ते, लोहभस्म और भाँगरा इन सबको समान भाग लेकर भेडके मूत्रमें मिलाकर शिरपर लेप करनेसे बाल काले होते हैं ॥
धात्र्याम्रमज्जलेपात्स्यात्स्थिरता स्निग्धकेशता ॥ ७९ ॥