Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1169 of 1416

Read in context
Page 1169

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११३७


चिरौंजी, मुलहठी, कूठ, उडद और सेंधानमक इनको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर शहदमें मिलाकर लेप करे या उक्त औषधोंको २१ दिनतक उडदोंकी काँजीमें भिगोकर फिर पीसकर लेप करे तो दारुणकरोग शीघ्र नष्ट होता है ६७

सहनीलोत्पलकेशरयष्टिमधुतिलैः सहशमामलकम् ।
चिरजातमपि च शीर्षे दारुणकरोगं शमं नयति ॥ ६८ ॥

नीलेकमलकी केशर, मुलहठी, तिल और आमले इनको समभाग लेकर एकत्र पीसकर शिरपर लेप करे तो इससे बहुत पुराना दारुणकरोगभी शान्त होता है ॥

इन्द्रलुप्तकी चिकित्सा ।

इन्द्रलुप्ते शिरां विद्ध्वा शिलाकासीसतुत्थकैः ॥
परितो लेपयेत्कल्कैस्तै ऽ चाभ्यञ्जने हितम् ॥
कुटन्नटशिखोजातीकरञ्जकरवीरजैः ॥ ६९ ॥

इन्द्रलुप्तरोगमें शिराको वेधकर ( फस्त खुलवाकर ) मैनसिल, कसीस और तूतिया इनको समानभाग लेकर एकत्र पीसकर लेप करे। अथवा नागरमोथा, चीतेकी जड, चमेलीके फूल, करञ्जकी छाल और सफेद कनेरकी जड इन सबको एकत्र कूट पीसकर लेप करे। इसमें तेलकी मालिश करना हितकर है ॥ ६९ ॥

अवगाढपदं चैव प्रच्छयित्वा पुनः पुनः ।
गुञ्जाफलैश्चिरं लिम्पेत्केशभूमिं समन्ततः ॥ ७० ॥

पहले इन्द्रलुप्तको सुईसे छेदन करे, पश्चात् चोंटलियोंको जलमें अच्छे प्रकारसे पीसकर बार बार बालोंकी जगह लेप करे। इससे बाल उगआते हैं ॥ ७० ॥

हस्तिदन्तमसीं कृत्वा मुख्यं चैव रसाञ्जनम् ।
लोमान्यनेन जायन्ते नृणां पाणितलेष्वपि ॥ ७१ ॥

हाथीके दाँतकी भस्म करके उसको रसौंतके चूर्ण और जलमें मिलाकर लेप करे। जब इससे मनुष्योंकी हथेलीमेंभी रोम उत्पन्न होजाते हैं तब अन्य स्थानका तो कहनाही क्या ? ॥ ७१ ॥

हस्तिदन्तमसीं कृत्वा तैलेन सह योजयेत् ।
हस्तेष्वपि प्रजायन्ते केशा नास्त्यत्र संशयः ॥ ७२ ॥

हाथीदांतकी भस्मको तिलके तेलमें मिलाकर लेप करनेसे इन्द्रलुप्तरोग नष्ट होकर बाल निकल आते हैं। इसके प्रयोगसे हाथोंमेंभी बाल उत्पन्न होजाते हैं, इसमें कुछभी सन्देह नहीं है ॥ ७२ ॥

७२