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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1121 of 1416

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Page 1121

चिकित्सा ] भाषाटीकासहितः । १०८९

शीतपित्त उदर्द और कोठरोगकी चिकित्सा ।

अभ्यङ्गः कटुतैलेन सेकश्चोष्णाम्बुभिस्तथा ।
उदर्द्दे वमनं कार्यं पटोलारिष्टवारिणा ॥ १ ॥
त्रिफलापुरकृष्णाभिर्विरेकश्चात्र शस्यते ।
अमृतादिं विसर्पोक्तं भिषगत्र प्रयोजयेत् ॥ २ ॥

उदर्दरोगमें सरसोंके तेलकी मालिशकर गरम जलसे सेंक करे, फिर पटोलपत्र और नीमकी छालके काढ़ेमें मैनफलका चूर्ण डालकर रोगीको पान कराकर वमन करावे। पश्चात् हरड, बहेडा, आमला, गूगल और पीपल इनके काथद्वारा विरेचन (जुलाब) करावे। इस रोगमें विसर्परोगाधिकारमें कहा हुआ अमृतादिक्वाथ पान करानेसे विशेष लाभ होता है ॥ १ ॥ २ ॥

सगुडं दीप्यकं यस्तु खादेत्पथ्यान्नभुङ्नरः ।
तस्य नश्यति सप्ताहादुदर्दः सर्वदेहगः ॥ ३ ॥

पथ्य द्रव्योंका भोजन करनेवाला मनुष्य यदि पुराना गुड और अजवायन इन दोनोंको एकत्र मर्दनकर सात दिनतक खाय तो उसका सर्वशरीरगत उदर्दरोग नष्ट होता है ॥ ३ ॥

दूर्वानिशायुते लेपः कण्डूपामाविनाशनः ।
कृमिदद्रुहरश्चैव शीतपित्तापहः स्मृतः ॥
क्षारसैन्धवतैलेन गात्राभ्यङ्गं प्रकारयेत् ॥ ४ ॥

दूब और हल्दीको एकत्र पीसकर लेप करनेसे कण्डू (खुश्क खुजली) और पामा (तर खुजली) नष्ट होती है। जवाखार और सैंधेनमकको तिलके तेलमें मिलाकर मालिश करनेसे कृमि, दद्रुकुष्ठ और शीतपित्तरोग दूर होता है ॥ ४ ॥

अग्निमन्थभवं मूलं पिष्टं पीतं च सर्पिषा ।
शीतपित्तोदर्दकोठान् सप्ताहादेव नाशयेत् ॥ ५ ॥

अरणीकी जडको पीसकर घीमें मिलाकर पान करे तो शीतपित्त, उदर्द और कोठरोग सात दिनमें ही नाश होजाते हैं ॥ ५ ॥

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