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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1120 of 1416

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Page 1120
१०८८भैषज्यरत्नावली ।[ कुष्ठरोग-

मूत्राणि गोखरोष्ट्राश्वमहिषीजनितानि च ।
कस्तूरिकागन्धसारस्तिक्तानि क्षारकर्म च ॥
यथादोषं समस्तानि पथ्यान्येतानि कुष्ठिनाम् ।

कुष्ठरोगमें एक एक पक्ष पीछे वमन, एक एक महीने पीछे विरेचन (जुल्लाब) देवे, तीन तीन महीनें बीतें नस्य और छः छः महीनेके अन्तरसे रक्तमोक्षण (फस्तखुलवाना) करावे। घीका लेप करे एवं पुराने जौ, गेहूँ, शालिचावल, मूँग अरहर, मसूर इनका भोजन, शहद, जंगली जीवोंका मांस ढकपन्ना, बेंतकी कोंपल, परबल, बडी कटेरीके फल, मकोय, नीमके पत्ते, लहसन, हुलहुलका शाक, पुनर्नवा मेढ़ासिंगी, चकवडके पत्ते, भिलावे, पके ताडके फल, खैर, चीता त्रिफला, जायफल, नागकेशर, केशर, पुराना घी, तोरई, करञ्ज, तिल, सरसों, नीम और हिंगोट इनका तेल, हलके पदार्थ, धूपसरल, देवदारु, शीशम और अगर इनका तेल, गौ, गधा, ऊँट, घोडा और भैंस इन सबोंके मूत्र, कस्तूरी, सफेदचन्दन, तीखेरसवाले द्रव्य और क्षारकर्म ये सब दोषानुसार सेवन करनेसे कुष्ठरोगियोंके लिये हितकारी है ॥ ३९-२४५ ॥

कुष्ठरोगमें अपथ्य !

पापानि कर्माणि कृतघ्नभावं निन्दां गुरूणां गुरुधर्षणं च ।
विरुद्धपानाशनमह्नि निद्रां चण्डांशुतापं विषमाशनं च ॥ ४६ ॥
स्वेदं रतं वेगनिरोधमिक्षुं व्यायाममम्लानि तिलांश्च माषान् ।
द्रवान्नगुर्वन्नवान्नभुक्तं विदाहि विष्टंभि च मूलकानि ॥ ४७ ॥
सह्याद्रिविन्ध्याद्रिसमुद्भवानां तरङ्गिणीनामुदकानि चापि ।
आनूपमांसं दधिदुग्धमद्यं गुडं च कुष्ठामयिनस्त्यजेयुः ॥४८॥

पापकर्म, कृतघ्नता, गुरुओंकी निन्दा, गुरुजनोंका तिरस्कार करना, स्वभाव-विरुद्ध भोजन-पान करना, दिनमें सोना, प्रचण्ड धूपका सेवन, विषम भोजन, स्वेद-देना, स्त्रीप्रसंग, मल-मूत्रादिके वेगको रोकना, ईखके रसका पान, कसरत करना, खट्टे पदार्थ, तिल, उडद, पतले पदार्थ, दुष्पाच्य अन्न, नये नाजोंका भोजन, दाह-कारक-विबन्धकारक द्रव्य, मुली, सह्याचल और विन्ध्याचलसे निकली हुई नदियों का जल, अनूपदेशजात जीवोंका मांस, दही दूध, मदिरा और गुड ये सब अपथ्य पदार्थ कुष्ठरोगियोंको त्याग देना चाहिये ॥ ४६-२४८ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां कुष्ठरोगचिकित्सा ॥