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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 1113

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०८१


बापची, हल्दी, दारुहल्दी, सफेद सरसों, कूठ, करञ्ज, चकवडके बीज, और अमलतासके पत्ते इन औषधियोंके समान भाग मिश्रित कल्कके द्वारा सरसोंके तेलको पकावे । यह तेल मर्दन करनेसे नासूरको शीघ्र दूर करता है तथा अठारह प्रकारके कुष्ठ, नीलिका, पिडिका, व्यंग, गम्भीर वातरक्त, कण्डू, कच्छू, दद्रु और पामा इत्यादिरोग इस तेलके लगानेसे तत्काल नष्ट होते हैं ॥

बृहत्सोमराजीतैल ।

सोमराजीतुल़ाक्वाथे तथा दद्रुहणस्य च ।
गोमूत्रस्य तथा पात्रे कल्कं दत्त्वा विचक्षणः ॥ ९६ ॥
विपचेत्कार्षिकैर्भागैःप्रस्थं तैलं तु सार्षपम् ।
चित्रकं लाङ्गलाख्या च नागरं कुष्ठमेव च ॥ ९७ ॥
हरिद्रा नक्तमालं च हरितालं मनःशिला ।
आस्फोटार्ककरवीरं सप्तपर्णं च गोमयम् ॥ ९८ ॥
खदिरो निम्बपत्रं च मरिचं कासमर्दकम् ।
एतानि श्लक्ष्णपिष्टानि कल्कंदत्त्वा विचक्षणः ॥ ९९ ॥

बापचीका क्वाथ १०० पल, चकवडके बीजोंका क्वाथ १०० पल, गोमूत्र ३२ सेर, सरसोंका तेल ६४ तोले और चीता, कलिहारी, सोंठ, कूठ, हल्दी, करञ्ज, हरिताल, मैनसिल, आस्फोट (लता विशेष), आककी जड, सफेद कनेरकी जड, सतौनेकी छाल, गोबरका रस, खैर, नीमके पत्ते, मिरच और कसौंदी इनको दो दो तोले लेकर खूब बारीक पीसकर कल्क बनावे । फिर सबोंको एकत्र मिलाकर अच्छेप्रकार तेलको पकावे ॥ ९६-९९ ॥

हन्ति सर्वाणि कुष्ठानि कृमिदुष्टव्रणानि च ॥ २०० ॥
किटिभं दद्रुजातं च गात्रवैवर्ण्यमेव च ।
विशीर्णचर्ममांसादिदृढीकरणमुत्तमम् ।
पाण्डुरोगं तथा कण्डूं विसर्पं हन्ति दारुणम् ।
ये चान्ये त्वग्गता रोगास्तांस्तु शीघ्रं व्यपोहति ॥ १ ॥

यह यथाविधि सेवन करनेसे सर्वप्रकारके कुष्ठ, कृमिरोग, दुष्टव्रण, किटिभकुष्ठ, दद्रुकुष्ठ, शरीरकी विवर्णता, त्वचाका फटना, पाण्डुरोग, कण्डू और दारुण विसर्प इत्यादिरोगोंको शीघ्र नष्ट करताहै और अन्यान्य जितने त्वचासम्बन्धी रोग हैं उन