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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1112 of 1416

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Page 1112
१०८०भैषज्यरत्नावली ।[ कुष्ठरोग-

छाल, सतौनेकी छाल, थूहरका दूध, गिलोय, अमलतास, करञ्ज, नागरमोथा, खैर, पीपल, वच और मालकांगुनी ये औषधियाँ पृथक् पृथक् चार चार तोले और मीठा तेलिया ८ तोले, कडवा तेल १ आढक और गोमूत्र ४ आढक परिमाण लेवे। प्रथम पूर्वोक्त औषधियोंका कल्क बनालेवे फिर सबोंको यथाविधि एकत्रकर मिट्टीके अथवा लोहेके पात्रमें मन्द मन्द अग्निद्वारा तेलको सिद्ध करे ॥ ८५-८८ ॥

पक्त्वा तैलवरं ह्येतन्मृक्षयेत्कुष्ठकान् व्रणान् ।
पामाविर्चचिकादद्रुकण्डूविस्फोटकानि च ॥ ८९ ॥
वलयः पलितं छाया नीली व्यङ्गस्तथैव च ।
अभ्यङ्गेन प्रणश्यन्ति सौकुमार्यं च जायते ॥ ९० ॥
प्रथमे वयसि स्त्रीणां यासां नस्यञ्च दीयते ।
परामपि जरां प्राप्य न स्तना यान्ति नम्रताम् ॥ ९१ ॥
बलीवर्दस्तुरङ्गो वा गजो वायुनिपीडितः ।
एभिरभ्यञ्नैर्गाढं भवेन्मारुतविक्रमः ॥ ९२ ॥

उत्तम प्रकारसे पकाकर सिद्ध किये हुए इस तेलको कुष्ठके व्रणोंपर लगावे तो कुष्ठव्रण शीघ्र नष्ट होते हैं। यह तेल पामा, विचर्चिका, दाद, कण्डू, विस्फोटक, वली, पलित, छाया, नीली और व्यङ्ग इन सब रोगोंको अभ्यंगमात्रसेही नष्ट कर देताहै तथा सुकुमारताको उत्पन्न करताहै। जिन स्त्रियोंकी बाल्यावस्थामेंही इस तेलको नास दिया जाताहै उनके अत्यन्त वृद्धताको प्राप्त होनेपर भी स्तन नम्रताको प्राप्त नहीं होते। यदि बैल, घोडा अथवा हाथी वायुरोगसे पीडित हों तो उनके अंगोंपर इस तेलका गाढा गाढा लेप करे तो वे वायुके वेगके समान पराक्रमी होजाते हैं ॥ ८९-९२ ॥

सोमराजीतैल ।

सोमराजी हरिद्रे द्वे सर्षपाः कुष्ठमेव च ।
करञ्जैडगजाबीजं पत्राण्यारग्वधस्य च ॥ ९३ ॥
विपचेत्सार्षपं तैलं नाडीदुष्टव्रणापहम् ।
अनेनाशु प्रशाम्यन्तिकुष्ठान्यष्टादशैव तु ॥ ९४ ॥
नीलिका पिडिका व्यङ्गा गम्भीरं वातशोणितम् ।
कण्डूकच्छूप्रशमनं दद्रुपामानिवारणम् ॥ ९५ ॥