भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
Public domain in India · Report a copyright issue
Page 1061 of 1416
Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०२९
त्रिफलाके क्वाथमें बिलावकी हड्डीको घिसकर लेप करनेसे भगन्दरका दुष्टव्रण अल्पकालमें नष्ट होता है ॥ ५ ॥
भगन्दरं प्रत्यहं तु सुधौतं त्रिफलाम्बुना ॥ ६ ॥
प्रतिदिन त्रिफलेके क्वाथसे भगन्दरको धोना चाहिये ॥ ६ ॥
खरास्रपक्वभूनागचूर्णलेपो भगन्दरम् ।
हन्ति दन्त्यग्न्यतिविषालेपस्तद्वच्छुनोऽस्थि वा ॥ ७ ॥
गधेके खूनमें केंचुओंके चूर्णको पकाकर लेप करनेसे भगन्दर रोग नष्ट होता है अथवा दन्तीकी जड, आककी जड और अतीस इनको एकत्र पीसकर लेप करें किम्वा कुत्तेकी हड्डीको त्रिफलेके क्वाथमें घिसकर प्रलेप करे तो भगन्दर दूर होता है ॥ ७ ॥
शम्बूकस्य च मांसानि भक्षयेद्व्यञ्जनादिभिः ।
अजीर्णवर्गी मासेन मुच्यते स भगन्दरात् ॥ ८ ॥
जो अजीर्णकारक द्रव्योंको छोडकर अनेक प्रकारके व्यञ्जन और आहारके साथ शम्बूक (घोंघा) के मांसको एक महीनेतक भक्षण करे तो वह भगन्दररोगी भगन्दररोगसे मुक्त होता है ॥ ८ ॥
नारायणरस ।
दरदं पार्वतीपुष्पं कुनटी पुरुषो रसः ।
शोणितं गन्धको दैत्यः सैन्धवातिविषे चवी ॥ ९ ॥
शरपुङ्खा विडङ्गश्च यमानी गजपिप्पली ।
मरिचार्कौ च वरुणो धूनकं च हरितकी ॥
सम्मर्द्य कटुतैलेन गुटिकां कारयेद्भिषक् ॥ १० ॥
सिंगरफ, गोपीचन्दन, रसौंत, मैनसिल, सुवर्ण, शुद्ध पारा, ताँबा, शुद्ध गन्धक, लोहा, सैन्धानमक, अतीस, चव्य, शरफोंका, वायविडङ्ग, अजवायन, गजपिपल, कालीमिरच, आककी मूल, वरुणाकी जड, सफेद राल और हरड इन सब द्रव्योंको १-१ तोला ले सरसोंके तेलमें खरलकरके गोलियाँ बनालेवे ॥ १० ॥
नाडीव्रणं प्रदुष्टं च गण्डमालां विचर्चिकाम् ।
चिरदुष्टव्रणं दद्रुं पूतिकर्णं शिरोगदम् ॥ ११ ॥
हस्तपादपरिस्फोटं दुःसाध्यं च भगन्दरम् ।
एतान्त्रोगान्निहन्त्याशु गजेन्द्रमिव केसरी ॥ १२ ॥