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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1060 of 1416

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Page 1060

१०२८ भैषज्यरत्नावली। [ भगन्दर -

मनुष्यके शिरकी हड्डीको पीसकर उसके द्वारा सिद्ध कियेहुए तेलको लगानेसे फूटा हुआ व्रण शीघ्र सूखता है ॥ २६ ॥
नाडीव्रणमें पथ्य और अपथ्य व्रणशोथकी समान करना चाहिये ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां नाडीव्रणचिकित्सा ।

भगन्दरकी चिकित्सा ।

गुदस्य श्वयथुं दृष्ट्वा विशोष्य शोधयेत्ततः ।
रक्तावसेचनं कार्यं यथा पाकं न गच्छति ॥ १ ॥
गुदाकी सूजनको देखकर तत्काल रोगीको लंघन कराकर सुखावे और दस्त कराकर शुद्ध करे। यदि इस प्रकार करनेसे सूजन कम न हो तो शोथस्थानमें जोंक लगवाकर रुधिरको निकलवावे। इस प्रकार करनेसे शोथ पकता नहीं है ॥ १ ॥

वटपत्रेष्टकाशुण्ठीगुडूच्यः सपुनर्नवाः ।
सुपिष्टाः पिडिकान्ते च लेपः शस्तो भगन्दरे ॥ २ ॥
बडके पत्ते, ईंट, सोंठ, गिलोय और पुनर्नवा इन सबोंको समान भाग लेके एकत्र पीसकर भगन्दरकी गूमडियें जहाँतक फैली हों वहाँतक लेप करना ॥ २ ॥

स्नुह्यर्कदुग्धदार्बीभिर्वर्तिं कृत्वा विचक्षणः ।
भगन्दरगतिं ज्ञात्वा पूरयेत्तां प्रयत्नतः ॥
एषा सर्वशरीरस्थां नाडीं हन्यान्न संशयः ॥ ३ ॥
थूहरका दूध, आकका दूध और दारुहल्दी इनको एकत्र पीसकर बत्ती बनाकर बहते हुए भगन्दरमें सप्रयत्न प्रवेश करे । यह बत्ती शरीरकी सम्पूर्ण नाडियोंके विकारोंको दूर करती है ॥ ३ ॥

तिलाभयाकुष्ठमरिष्टपत्रं निशे वचा लोध्रमगारधूमः ।
भगन्दरे नाड्युपदंशयोश्च दुष्टव्रणे शोधनरोपणोऽयम् ॥४॥
तिल, हरड, कूठ, नीमके पत्ते, हल्दी, दारुहल्दी, वच, लोध और गृहधूम इन सबको समान भाग लेकर एकत्र पीसलेवे। फिर इस चूर्णको भगन्दर, नाडीव्रण और उपदंशके दुष्ट व्रणोंपर लेप करनेसे उक्तव्रण शुद्ध होकर भरते हैं ॥ ४ ॥

त्रिफलारससंपिष्टबिडालस्थिप्रलेपनम् ।
भगन्दरं निहन्त्याशु दुष्टव्रणहरं परम् ॥ ५ ॥