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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1050 of 1416

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१०१८ भैषज्यरत्नावली । [ भग्न-


भग्नकी चिकित्सा ।

आदौ भग्नं विदित्वा तु सेचयेच्छीतलाम्बुना ।
पङ्केनालेपनं कार्य्यं बन्धनं च कुशान्वितम् ॥
सुश्रुतोक्तं तु भग्नेषु वीक्ष्य बन्धनमाचरेत् ॥ १ ॥

सुश्रुतमें कही हुई विधिके अनुसार भग्न (टूटे) स्थानको जानकर प्रथम उक्त स्थानमें शीतल जल सिञ्चन करे। पुनः कर्दमका लेप कर कुशादिसे बंधन करे अथवा उक्त ग्रन्थमें प्रतिपादित रीतिसे भग्नस्थानको भले प्रकार देखकर बंधन करना उचित है ॥ १ ॥

अवनामितमुन्नयेदुन्नतं चावपीडयेत् ।
आञ्चेदतिक्षिप्तमध्ये गतं चोपरि वर्त्तयेत् ॥ २ ॥
आलेपनार्थं मञ्जिष्ठां मधुकं चाम्लपेषितम् ।
शतधौतघृतोन्मिश्रं सौम्येष्वृतुषु मोक्षणम् ॥ ३ ॥
कर्त्तव्यं स्यात्त्रिरात्राच्च तत्राग्नेयेषु जानता ।
काले च समशीतोष्णे पञ्चरात्राद्विमोक्षयेत् ॥ ४ ॥

भग्नस्थानकी टूटी हुई हड्डीको नीचे दबजानेपर ऊँचा करे और अधिक ऊंची होनेपर तत्क्षण नीचेको दबा देवे। हड्डीके ऊपरको हटजानेपर नीचेको दबावे और नीचेको झुकजानेपर उसे धीरे धीरे दबाकर ऊपरको खींचे और शनैः शनैः मलकर यथास्थानमें करदेवे मञ्जीठ और मुलहठीको काँजीमें पीसकर अथवा शालिधानके चावलोंको पीसकर सौबार धुले हुए घृतमें मिलाकर भग्नस्थानमें लेप करके बाँधदेवे। इस बंधनको हेमन्त और शीतकालमें ७ दिनके बाद, ग्रीष्मकालमें ३ दिनके बाद तथा वर्षा और शरत्कालमें ५ दिनके बाद खोले ॥ २–४ ॥

न्यग्रोधादिकषायं च सुशीतं परिषेचने ।
पञ्चमूलीविपक्वं तु क्षीरं दद्यात्सवेदने ॥ ५ ॥
सुखोष्णमवतार्य वा तत्र तैलं विजानता ।
मांसं मांसरसः सर्पिः क्षीरं यूषं सतीनजः ॥
बृंहणं चान्नपानं स्याद्धेयं भग्नाय जानता ॥ ६ ॥

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