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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 1049

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०२७

अन्तर्दग्धकुठारको दहनजं लेपान्निहन्ति व्रणम्
अश्वत्थस्य विशुष्कवल्कलकृतं चूर्ण तथा गुण्डनात्॥१४॥
सफेद वनतुलसीको अन्तर्धूमपात्रमें भस्म करके अग्निद्वारा जले हुए व्रणपर लेप करनेसे अथवा पीपलकी सूखी छालको उस विधिके अनुसार भस्म करके बारीक पीसकर लेप करनेसे अग्निदग्धव्रण शीघ्र नष्ट होता है ॥ १४ ॥

अभ्यङ्गाद्विनिहन्ति तैलमखिलं गण्डूपदैः साधितं
पिष्ट्वा शाल्मलितूलकैर्जलगता लेपात्तथा वालुकाः ॥१५॥
केंचुओंको और तिलोंके तेलको एकत्र विधिपूर्वक पकाकर मालिश करनेसे अथवा सेमलकी रुईको जलमें पीसकर या जलकी रेणुकाको पीसकर लेप करनेसे अग्निसे जला हुआ घाव तत्काल शुष्क होता है ॥ १५ ॥

जीरकघृत ।

जीरकपक्वं पश्चात् सिक्थकसर्जरसमिश्रितं हरति ।
घृतमभ्यङ्गात्पावकदग्धजदुःखं क्षणार्द्धेन ॥ १६ ॥
जीरेके कल्कको १ सेर लेकर ८ सेर जलमें पकावे । पकते पकते जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें मोम १६ तोले राल १६ तोले और घृत दो सेर डालकर विधिपूर्वक पकावे । इस घृतको लगानेसें जले हुए घावकी पीडा क्षणमात्रमें ही दूर होती है ॥ १६ ॥

पाटलीतैल ।

सिद्धं कल्ककषायाभ्यां पाटल्याः कटुतैलकम् ।
दग्धव्रणरुजास्रावदाहविस्फोटनाशनम् ॥ १७ ॥
पाढलके कल्क और क्वाथद्वारा सिद्ध किया हुआ कडवा तेल, दग्धव्रणकी वेदना, रक्तका निकलना, जलन और भयंकर फोडोंको नष्ट करता है ॥ १७ ॥

मञ्जिष्ठाद्यतैल ।

मञ्जिष्ठां चन्दनं मूर्वां पिष्ट्वा तैलं विपाचयेत् ।
सर्वेषामग्निदग्धानामेतद्रोपणमिष्यते ॥ १८ ॥
मंजीठ, लालचन्दन और मूर्वा इनको समान भाग मिश्रित एक सेर लेकर एकत्र पीसलेवे । फिर इस कल्कके द्वारा उपर्युक्त विधिके अनुसार दो सेर सरसोंके तेलको सिद्ध करे । यह तेल सर्व प्रकारके अग्निसे जले हुए घावोंपर व्यवहार किया जाता है । सद्योव्रणरोगमें पथ्य और अपथ्य व्रणशोथरोगकी भाँति करना चाहिये ॥ १८ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां सद्योव्रणचिकित्सा ॥