भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context९८० | भैषज्यरत्नावली । | [ गलगण्डादि-
गलगण्डरोगमें जौ, मूँग, परवल, चरपरे और रूखे द्रव्योंका भोजन एवं वमन और रक्तमोक्षण क्रिया करे ॥ १ ॥
तण्डुलोदकपिष्टेन मूलेन परिलेपितः ।
हस्तिकर्णपलाशस्य गलगण्डः प्रशाम्यति ॥ २ ॥
हस्तिकर्णनामक ढालकी जडको चावलोंके जलमें पीसकर लेप करनेसे गलगण्डरोग शान्त होता है ॥ २ ॥
सर्षपान् शिग्रुबीजानि शणबीजातसीयवान् ।
मूलकस्य च बीजानि तक्रेणाम्लेन पाययेत् ॥ ३ ॥
गलगण्डो ग्रन्थयश्च गण्डमालाः सुदारुणाः ।
प्रलेपात्तेन शाम्यन्ति विलयं यान्ति चाचिरात् ॥ ४ ॥
सरसों, सहिंँजनेके बीज, सनके बीज, अलसी, जौ और मूलीके बीज इन सबको समान भाग लेवे और एकत्रित करके खट्टे मट्ठेके साथ पीसकर पान करावे और लेप करे तो इससे बहुत पुरानी गलगण्ड, ग्रन्थिरोग और दारुण गण्डमाला आदि रोग तत्काल नाश होते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥
जीर्णकर्कारुकरसो विडसैन्धवसंयुतः ।
नस्येन हन्ति तरुणं गलगण्डं न संशयः ॥ ५ ॥
पुराने भेलियाकद्दूके रसमें विरियासञ्चर नमक और सेंधानमक मिलाकर नास देनेसे नवीन गलगण्डरोग निस्सन्देह दूर होता है ॥ ५ ॥
जलकुम्भीकजं भस्म पक्वं गोमूत्रगालितम् ।
पिबेत्कोद्रवभक्ताशी गलगण्डप्रशान्तये ॥ ६ ॥
जलकुम्भीकी भस्मको गोमूत्रमें पकाकर और वस्त्रमें छानकर पीवे और इसपर कोदों अन्नका भोजन करे तो गलगण्डको शीघ्र शान्त करता है ॥ ६ ॥
सूर्यावर्त्तरसोनाभ्यां गलगण्डापनाहनः ।
स्फोटास्रावैः शमं याति गलगण्डो न संशयः ॥ ७ ॥
हुलहुल और लहसुनको समान भाग लेकर पीसलेवे । फिर इनके रसको गलगण्डपर लेप करके स्वेद देवे । इससे फोडेके समान बहकर गलगण्डरोग निश्चय नष्ट होजाता है ॥ ७ ॥
तिक्तालाबूफले पक्के सप्ताहमुषितं जलम् ।
मद्यं वा गलगण्डघ्नं पानात्पथ्यानुसेविनः ॥ ८ ॥