भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९७९
करे और इसपर दूध भात सर्वदा भक्षण करे। यह गंधर्वहस्तकनामवाला तेल अन्त्रवृद्धिरोगको बहुत शीघ्र नाश करता है॥
वृद्धिरोगमें पथ्य।
संशोधनं वस्तिरसृग्विमोक्षः स्वेदः प्रलेपोऽरुणशाल-
यश्च । एरण्डतैलं सुरभीजलं च धन्वामिषं शिग्रुफलं
पटोलम् ॥ ६३ ॥ पुनर्नवा गोक्षुरकोऽग्निमन्थस्ताम्बूल-
पथ्या सरलं रसोनम् । वातिङ्गानो गृञ्जनकं मधूनि
कौम्भं घृतं तप्तजलं च तक्रम् ॥ यथाश्रुतं शस्त्रविधिश्च
वर्गः स्याद्ब्रध्नवृद्ध्यामयिनां सुखाय ॥ ६४ ॥
दोषशमनकारक औषधि प्रयोग, पिचकारी लगाना, रक्त निकलवाना, पसीना देना, लेप करना, लाल शालिके चावलोंका भोजन, अण्डीका तेल, गोमूत्र, मरुदेशके पशु पक्षियोंका मांस, सहिंजनेकी फली, परवल, पुनर्नवा, गोखुरू, अरणी, पान, हरड, धूपसरल, लहसुन, बैंगन, गाजर, शहद, १० वर्षका पुराना घी, गरम जल, मट्ठा इनका सेवन और शास्त्रोक्त विधिके अनुसार शस्त्रक्रिया करना ये समस्त उपचार ब्रध्न और अण्डवृद्धिवाले रोगियोंके सुखके वास्ते हैं ॥
वृद्धिरोगमें अपथ्य ।
विरुद्धपानान्नमसात्म्यसेवा संक्षोभणं हस्तिहयादियानम् ।
आनूपमांसानि दधीनि माषा दुग्धानि पिष्टान्नमुपोदिका च ॥
गुरूणि शुक्रोत्थितवेगरोधः स्युर्ब्रध्नवृद्ध्यामयिनाममित्राः॥ ६५ ॥
स्वभावक विरुद्ध और अहितकर अन्न पान सेवन करना, क्षोभ करना, हाथी या घोडेकी सवारी करना, अनूपदेशवाले जीवोंका मांस, दही, दूध, उड़द, पिसेहुए अन्न, पोईका शाक, भारी पदार्थोंका सेवन करना तथा वीर्यके वेगको रोकना; ये सब ब्रध्न और वृद्धिवाले रोगियोंको अहितकर हैं ॥ ६५ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां वृद्धिरोगचिकित्सा ।
गलगण्डादिकी चिकित्सा ।
यवमुद्गपटोलानि कटु रूक्षं च भोजनम् ।
छर्दिं सरक्तमुक्तिं च गलगण्डे प्रयोजयेत् ॥ १ ॥