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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 1002 of 1416

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Page 1002

९७० | भैषज्यरत्नावली । | [ वृद्धिरोग-

स्विन्नं मेदःसमुत्थं च लेपयेत्सुरसादिना ।
शिरोविरेकद्रव्यैर्वा सुखोष्णैर्मूत्रसंयुतैः ॥ ६ ॥
मेदजन्य अण्डवृद्धिरोगमें कोषोंमें गरम गोबरसे स्वेद देकर निर्गुण्डी, तुलसी आदि सुरसादिगणकी औषधियोंका लेप करे। अथवा पीपल और कालीमिरच आदि शिरोविरेचक औषधियोंको मन्दोष्ण गोमूत्रके साथ पीसकर नस्य देवे ॥ ६ ॥

तैलमेरण्डजं पीत्वा बलासिद्धपयोऽन्वितम् ।
आध्मानशूलाग्निमान्द्यमन्त्रवृद्धिं जयेन्नरः ॥ ७ ॥
खिरेंटी २ तोले, दूध ८ तोले और जल ३२ तोले इनको एकत्रकर पाक करे। जब पकते २ दुग्धमात्र शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। इस दुग्धमें अण्डीका तेल डालकर पान करनेसे अफारा, शूलरोग, मन्दाग्नि और अन्त्रवृद्धि नष्ट होती है ॥७॥

निष्पिष्टमारनालेन रूपिकामूलवल्कलम् ।
लेपो वृद्ध्यामयं हन्ति बद्धमूलमसौ दृढम् ॥ ८ ॥
सफेद आककी जडकी छालको काँजीमें पीसकर लेप करनेसे अत्यन्त प्रबल वृद्धिरोग भी नष्ट होता है ॥ ८ ॥

भृष्टो रुबूकतैलेन कल्कः पथ्यासमुद्भवः ।
कृष्णासैन्धवसंयुक्तो वृद्धिरोगहरः परः ॥ ९ ॥
हरडके कल्कको अण्डीके तेलमें भूनकर पीपल और सेंधानमकके चूर्णके साथ सेवन करे। इससे अत्यन्त प्रवृद्ध वृद्धिरोग नाश होता है ॥ ९ ॥

लज्जागृध्रमलाभ्यां च लेपो वृद्धिहरः परः ।
छुइमुई और गिद्धकी विष्ठा इन दोनोंको एकत्र पीसकर अण्डकोषोंपर लेप करनेसे वृद्धिरोग शमन होता है।

बध्रलक्षण ।

अत्यभिष्यन्दिगुर्वन्नसेवनान्निचयं गतः ।
करोति ग्रन्थिवच्छोथं दोषो वंक्षणसन्धिषु ॥
ज्वरशूलाङ्गदाहाढ्यं तं बध्रमिति निर्दिशेत् ॥ १० ॥
अत्यन्त कफवर्द्धक, भारी, स्निग्ध और कच्चे अन्नादि पदार्थोंके खानेसे वातादि दोष कुपित होकर वंक्षणकी सन्धि अर्थात् वस्तिके नीचे एवं जंघाके उपरिभागमें सूजन उत्पन्न करते हैं। जिस सूजनमें ज्वर, पीडा और सम्पूर्ण शरीरके अवयवोंमें दाह होती है उसको बध्रनरोग कहते हैं ॥ १० ॥