भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९६९
वृद्धिरोगकी चिकित्सा ।
गुग्गुलुं रुबुतैलं वा गोमूत्रेण पिबेन्नरः ।
वातवृद्धिं निहन्त्याशु चिरकालानुबन्धिनीम् ॥ १ ॥
गूगल और अण्डके तेलको गोमूत्रके साथ पीवे तो बहुत पुराना वातजन्य अण्ड-वृद्धि तत्काल नष्ट होती है ॥ १ ॥
सक्षीरं वा पिबेत्तैलं मासमेरण्डसम्भवम् ।
पुनर्नवायास्तैलं वा तैलं नारायणं तथा ॥
पाने वस्तौ रुबोस्तैलं पेयं वा दशकाम्भसा ॥ २ ॥
दूध और अण्डीके तेलको एकत्र मिलाकर एक महीनेतक सेवन करे अथवा पुनर्नवाके क्वाथ और कल्कद्वारा सिद्ध कियाहुआ सरसोंका तेल तथा नारायणतेल पीनेमें और बस्तिकर्म्ममें प्रयोग करे किम्वा दशमूलके काढेके साथ अण्डीके तेलकों पीवे । इससे अण्डवृद्धिरोग दूर होता है ॥ २ ॥
चन्दनं मधुकं पद्ममुशीरं नीलमुत्पलम् ।
क्षीरपिष्टैः प्रदेहः स्याद्दाहशोथरुजापहः ॥ ३ ॥
रक्तचन्दन, मुलहठी, कमलकेशर, खस और नीलकमल इन औषधियोंको समान भाग लेकर दूधमें पीसकर वृद्धिस्थानपर लेप करनेसे दाह, सूजन और पीडा दूर होती है ॥ ३ ॥
पञ्चवल्कलकल्केन सघृतेन प्रलेपनम् ।
सर्वपित्तहरं कार्यं रक्तजे रक्तमोक्षणम् ॥ ४ ॥
बड, गूलर पीपल, पाखर और बेंत इनकी छालको समान भाग ले एकत्र पीसकर घृतके साथ मिलाकर लेप करे और समस्त पित्तनाशक क्रिया करे तो पित्तज अण्डवृद्धि दूर होती है एवं रक्तजनित अण्डवृद्धिमें रक्तमोक्षण ( फस्द खुलवाना ) करावे ॥४॥
श्लेष्मवृद्धिं तूष्णवीर्यैर्मूत्रपिष्टैः प्रलेपयेत् ।
पीतदारुकषायं च पिबेन्मूत्रेण संयुतम् ॥ ५ ॥
कफोत्पन्न अण्डवृद्धिरोगमें उष्णवीर्य्य अर्थात् गरम अजगन्धादि औषधियोंकों गोमूत्रमें पीसकर लेप करे तथा देवदारुके गरम क्वाथको गोमूत्रके साथ पान करे तो उक्त विकार नष्ट होता है ॥ ५ ॥