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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

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DevanagariHindipublished486 pages

Page 40 of 486

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Page 40

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इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि बौधायन के समय बहुत से नीतिविषयक श्लोक, जो संभवतः स्मृतिग्रन्थों के अङ्ग थे, प्रचलित थे ।

बौधायनधर्मसूत्र में भौगोलिक उल्लेख

बौधायनधर्मसूत्र में कतिपय भौगोलिक उल्लेख भी महत्त्वपूर्ण हैं । उदाहरण के लिए इस धर्मसूत्र को दक्षिण भारत और उत्तर भारत की प्रथाओं और आचार में भेद का स्पष्ट ज्ञान है । १२ में कहा गया है ।

"पञ्चधा विप्रतिपत्तिर्दक्षिणतस्तथोत्तरतः" दक्षिण और उत्तर की सीमा स्पष्ट करते हुए व्याख्याकार गोविन्दस्वामी ने लिखा है : "दक्षिणेन नर्मदामुत्तरेण कन्यातीर्थम् । उत्तरस्तु दक्षिणेन हिमवन्तमुदग्विन्ध्यस्य ।"

शिष्टों के देश अथवा आर्यावर्त की सीमा बौ० १. २. १० में बतायी गयी है—
"प्रागदर्शनात् प्रत्यक्कालकवनाद्दक्षिणेन हिमवन्तमुदक्पारियात्रमेतदार्यावर्तं तस्मिन् य आचारस्स प्रमाणम् ।"

अर्थात् सरस्वती नदी के लुप्त होने के स्थान से पूर्व की ओर कालकवन नाम के वन से पश्चिम, हिमालय पर्वत से दक्षिण का और परियात्र पर्वत के उत्तर का भूभाग आर्यावर्त है ।

बौ० १. २. ११ के अनुसार गङ्गा और यमुना नदियों के बीच के प्रदेश को ही कुछ आचार्यों के मतानुसार आर्यावर्त बताया गया है—"गङ्गायमुनयोरन्तरमित्येके ।"

इसी सन्दर्भ में भाल्लविशाखा में प्रचलित एक गाथा का भी उद्धरण दिया गया है—
"पश्चात् सिन्धुर्विसरणी सूर्यस्योदयनं पुरः ।
यावत् कृष्णो विधावति तावद्धि ब्रह्मवर्चसमिति ॥ बौ० १. २. १३

पश्चिम में लुप्त होने वाली नदी, पूर्व में सूर्य के उदय का स्थान—इसके बीच जहां तक कृष्णमृग पाया जाता है, वहाँ तक ब्रह्मतेज भी पाया जाता है ।

बौधायन ने कई प्रदेशों को भी उल्लिखित किया है । सङ्कीर्णयोनि अथवा मिश्रित उत्पत्ति वाले प्रदेशों को गिनाते हुए उन्होंने निम्नलिखित प्रदेशों का उल्लेख किया है—

अवन्तयोऽङ्गमगधाः सुराष्ट्रा दक्षिणापथाः ।
उपावृत्सिन्धुसौवीरा एते सङ्कीर्णयोनयः ॥

अवन्ति, अङ्ग, मगध, सुराष्ट्र, दक्षिणापथ, उपावृत्, सिन्धु और सौवीर—ये सङ्कीर्ण-योनि प्रदेश हैं । इसी प्रकार आरह्य, कारस्कर, पुण्ड्र, सौवीर, वङ्ग, कलिङ्ग, प्रानून की यात्रा को दोषपूर्ण मानते हुए पुनस्तोम या सर्वपृष्ठा इष्टि करने का विधान निम्नलिखित सूत्र में है—

"आरट्टान् कारस्करान् पुण्ड्रान् सौवीरान्, वङ्गान् कलिङ्गान् प्रानूनानिति च गत्वा पुनस्तोमेन यजेत सर्वपृष्ठया वा ।” बौ० १. २. १५ कलिङ्ग प्रदेश के प्रति बौधायन में