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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

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DevanagariHindipublished486 pages

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की ओर संकेत करता है। तैत्तिरीय आरण्यक १०. १. १२ की ऋचा का उद्धरण बौ० २. ८. ३ में दिया गया है।

अन्य ब्राह्मणग्रन्थों के अन्तर्गत शतपथब्राह्मण से भी एक उद्धरण बौ. २. ११. ८ में है 'तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मयज्ञस्य वागेव जुहूर्मन उपभृच्चक्षुर्ध्रुवा मेधा स्रुवः सत्यमवभृथ-स्स्वर्गोलोक उदयनम्।'

गोपथब्राह्मण १. २. ६ का उद्धरण बौ० १. ४. ४ में द्रष्टव्य है—

'ब्रह्म वै मृत्यवे प्रजाः प्रायच्छत् तस्मै ब्रह्मचारिणमेव न प्रायच्छत्सोऽब्रवीदस्तु मह्यम-प्येतस्मिन् भाग इति यामेव रात्रिं समिधं नाऽऽहराता इति।'

आपस्तम्बयज्ञपरिभाषा के मन्त्रों को १. १७. १ में उद्धृत किया गया है।

इस प्रकार बौधायनधर्मसूत्र में श्रुति के प्रायः सभी अङ्गों के उद्धरण मिलते हैं।

प्राचीन आचार्यों के उल्लेख

बौधायन ने दूसरे धर्मसूत्रकारों और आचार्यों के उल्लेख भी किये हैं। बौ० १. २१. ४ में कश्यप के विचार का निर्देश है—

'क्रीता द्रव्येण या नारी सा न पत्नी विधीयते।
सा न दैवे न सा पित्र्ये दासीं तां कश्यपोऽब्रवीत्॥

इसी प्रकार हारीत के मत का निर्देश बौ० २. २. ११ में किया गया है : 'मिथ्यैतदिति हारीतः।'

औपजङ्घनि के विचार भी २. ३. ३३-३४ में अभिव्यक्त हैं। गौतम के मतों का भी इस धर्मसूत्र में दो बार उल्लेख है। प्रथमतः उत्तर और दक्षिण की प्रथाओं के सन्दर्भ में गौतम के इस मत को उद्धृत किया गया है कि देश में प्रचलन के आधार पर नियम प्रामाणिक नहीं होते। बौ० २. ४-१७ में भी गौतम का मत उद्धृत है—

'नेति गौतमोऽप्युग्रो हि क्षत्रधर्मो ब्राह्मणस्य।'

गौतम के धर्मसूत्र से कई स्थानों पर बौधायन ने उद्धरण भी लिये हैं। जनक के नाम का उल्लेख भी इस सूत्र में हुआ है, और इसमें स्वयं बौधायन के नाम का उल्लेख कई स्थानों पर किया गया है जैसे १. ७. १६ में 'अपि वा प्रतिशौचमामणिबन्धाच्छुद्धिरिति बौधायनः।' तथा

१. ७. ९ 'यदिच्छुद्धर्मसन्ततिमिति बौधायनः तथा १. ५. १३ 'एतेन विधिना प्रजापतेः परमेष्ठिनः परमर्षयः परमां काष्ठां गच्छन्तीति बौधायनः।'

आचार्य मौद्गल्य के मत का उल्लेख भी विधवा स्त्री के धर्म के सन्दर्भ में किया गया है, बौ. २. ४. ८ और कम अवस्था वाले ऋत्विक् आदि के अभिवादन के सन्दर्भ में कात्य का मत भी बौ. १. ३. ४७ में उद्धृत है।

बौधायनधर्मसूत्र और स्मृतिग्रन्थ

बौधायनधर्मसूत्र में मनुस्मृति और याज्ञवल्क्यस्मृति के अनेक पद्यों और पद्यों के भावों को व्यक्त किया गया है। विशेषतः मनुस्मृति से तो बहुत से पद्यों को ज्यों के त्यों ले लिया गया है। बौ० १. ८. १८ में निम्नलिखित सूत्र मनु से उद्धरण ही है—