बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in contextअष्टादशः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने दशमोऽध्यायः २९७
अन०-जो अन्न बिना मांगे मिला हो, जिसके विषय में पहले से निश्चय न किया गया हो, जो संयोगवश अपने आप ही उसे मिल गया हो उस अन्न से केवल उतना ही भोजन करे जितने से जीवन यात्रा चल सके ॥ १४ ॥
अयाचितमप्रार्थितम् । असंक्लृप्तमनवधृतं मनसाऽपि । यदृच्छयोपपन्नं नाम केनचित् प्रयोजनान्तरवशादानीतम् आहारमात्रं सूपोपदेशादिविस्ताररहितम् । प्राणयात्रिकं यथा प्राणो नाऽपगच्छति ॥ १४ ॥
अथाप्युदाहरन्ति-
अष्टौ ग्रासा मुनेर्भक्ष्याः षोडशारण्यवासिनः ।
द्वात्रिंशतं गृहस्थस्याऽपरिमितं ब्रह्मचारिणः ॥१५॥
अनु०-इस विषय में निम्नलिखित उद्धृत करते हैं-
संन्यासी का भोजन आठ ग्रास का होता है-ओर वानप्रस्थ का भोजन सोलह ग्रास का। गृहस्थ का भोजन बत्तीस ग्रास का होता है, किन्तु ब्रह्मचारी का भोजन अपरिमित होता है ॥ १५ ॥
अल्पाभ्यवहारार्थोऽयं नियमः ॥ १५ ॥
भैक्षं वा सर्ववर्णेभ्य एकान्नं वा द्विजातिषु ।
अपि वा सर्ववर्णेभ्यो न चैकान्नं द्विजातिष्विति ॥ १६ ॥
अनु०-द्विजातियों में सभी तीन वर्ण के व्यक्तियों के यहाँ से भिक्षान्न लिया जा सकता है अथवा उनमें एक ब्राह्मण का ही अन्न भिक्षा में प्राप्त कर भक्षण करे। अथवा सभी वर्णों से प्राप्त अन्न का भक्षण करे, द्विजातियों में केवल ब्राह्मण से प्राप्त भिक्षान्न को न खाये ॥ १६ ॥
सर्ववर्णग्रहणात् शूद्रान्नमध्येवाभ्युपगतम् । अतश्चैकान्नपक्षेऽपि द्विजातिग्रहण मुख्यस्यैव' ॥ १६ ॥
अथ यत्रोपनिषदमाचार्या ब्रुवते तत्रोदाहरिन्त-
स्थानमौनवीरासनसवनोपस्पर्शनचतुर्थषष्ठाष्टमकालव्रतयुक्तस्य ॥१७॥
अनु०-इस संबन्ध में आचार्य उपनिषद् का विवेचन करते हैं और निम्नलिखित विशेष नियम उद्धृत करते हैं। दिन में खड़ा रहे, वाणी का संयम करे, (रात्रि में) एक ही आसन में बैठे, (प्रातः, सायंकाल और मध्याह्न) तीनों सवनों के समय स्नान करे, केवल चौथे, छठे या आठवें भोजन की वेला में भोजन करे ॥ १७॥
यत्र ग्रहणं चित्तप्रणिधानार्थं तत्रोपनिषद्रहस्यं कर्तव्यतयाऽऽचार्या ब्रुवते ।