बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in context| २८६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ संन्यासविधिः |
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अथाऽपरेषाम्—
अथाऽप्युदाहरन्ति —
आश्रमादाश्रमं गत्वा हुतहोमो जितेन्द्रियः ।
भिक्षावलिपरिश्रान्तः पश्चाद्भवति भिक्षुक इति ॥ १६ ॥
**अनु०—**उस सम्बन्ध से निम्नलिखित पद्य उद्धृत करते हैं—
जिसने एक आश्रम से दूसरे आश्रम में प्रवेश किया है, हवन किया है और जितेन्द्रिय है, वह भिक्षा और बलि अर्पित करने से श्रान्त होकर स्वयं भिक्षुक अर्थात् संन्यासी बन जाता है ॥ १६ ॥
न केवलं त्रिवृत्प्राशनादेव भिक्षुकः । किं तर्हि ? वक्ष्यमाणैर्होमादिभिरपि । भिक्षुकः इति 'संज्ञायां कन्' इति कन्प्रत्ययः ॥ १६ ॥
स एष भिक्षुरानन्त्याय ॥ १७ ॥
**अनु०—**इस प्रकार का संन्यासी ब्रह्म के साथ सायुज्य प्राप्त करता है ॥ १७ ॥
अनन्त एवाऽऽनन्त्यम् , स चाऽऽत्मा तद्भावाय भवतीत्यर्थः ॥ १७ ॥
हुतहोम इत्युक्तम् , तदिदानीं प्रपञ्चयति—
पुराऽऽदित्यस्याऽस्तमयाद्गार्हपत्यमुपसमाधायाऽन्वाहार्यपचनमा-
हृत्य ज्वलन्तमाहवनीयमुद्धृत्य गार्हपत्ये आज्यं विलाप्योत्पूय स्रुचि
चतुर्गृहीतं गृहीत्वा 'समिद्धत्याऽऽहवनीये पूर्णाहुतिं जुहोति 'ओं स्वाहे'-
ति ॥ १८ ॥
**अनु०—**सूर्य के अस्त होने से पहले गार्हपत्य अग्नि प्रज्वलित करे, उस स्थान पर अन्वाहारपचन अग्नि लाकर जलते हुए आहवनीय अग्नि को निकाल कर गार्हपत्य अग्नि में घृत को पिघलावे, उसे ( कुश से ) शुद्ध करे स्रुक् से उसमें से चार बार अंश ग्रहण करे और समिध् रखकर प्रज्वलित किये गये आहवनीय अग्नि पर चार बार 'ओं स्वाहा' कहते हुए पूर्णाहुति करे ॥ १८ ॥
नाऽत्र तिरोहितं किञ्चिदस्ति ॥ १८ ॥
एतद्ब्रह्मान्वाधानमिति विज्ञायते ॥ १९ ॥
**अनु०—**इसी क्रिया को वेद में ब्रह्मान्वाधान कहते हैं ॥ १९ ॥
१ सप्त ते अग्ने समिधस्सप्त जिह्वास्सप्तर्षयस्सप्त धाम प्रियाणि । सप्तहोत्रास्सप्तधा त्वा यजन्ति सप्त योनीरा पृणस्वा घृतेन .। (तै०सं० १. ५. ३. २.) इति समिद्धती ॥