बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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वाराणसी से १९३४ में चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस ने भी गोविन्दस्वामी की टीका के साथ इसे प्रकाशित किया है।
बौधायनधर्मसूत्र तथा गौतमधर्मसूत्र
बौधायनधर्मसूत्र गौतमधर्मसूत्र के बाद के समय की रचना है। इसका सबल प्रमाण यही है कि बौधायनधर्मसूत्र में गौतम के मत का उल्लेख है। उदाहरणार्थ दक्षिण तथा उत्तर के विशिष्ट आचारों का उल्लेख कर बौधायनधर्मसूत्र में यह मत प्रतिपादित किया गया है कि जिस प्रदेश में जो आचार प्रचलित हैं वे प्रामाणिक हैं, किन्तु इसके विरोध में गौतम का मत उद्धृत किया गया है—
‘मिथ्यैतदिति गौतमः’ १.२.७.
ब्राह्मण के लिए क्षत्रिय वर्ण का कर्म उचित है या नहीं इस सम्बन्ध में भी गौतम का मत उद्धृत किया गया है—
‘नेतिगौतमोऽप्युग्रो हि क्षत्रधर्मो ब्राह्मणस्य’ २. ४. १७.
बौधायन ने गौतमधर्मसूत्र के १९ वें अध्याय के अनेक सूत्रों को उधार ले लिया है। इन सूत्रों की समानता द्रष्टव्य है—
| बौधायन ३. १० | गौतम ३. १ |
|---|---|
| उक्तो वर्णधर्मश्चाश्रमधर्मश्च ॥ १ ॥ | उक्तो वर्णधर्मश्चाऽऽश्रमधर्मश्च ॥ |
| अथ खल्वयं पुरुषो याप्येन कर्मणा ॥२॥ | अथ खल्वयं पुरुषो याप्येन कर्मणा लिप्यते...॥ २ ॥ |
| तत्र प्रायश्चित्तं कुर्यान्न कुर्यादिति ॥३॥ | तत्र प्रायश्चित्तं कुर्यान्न कुर्यादिति मीमांसन्ते ॥ ३ ॥ |
| न हि कर्म क्षीयते इति ॥ ५ ॥<br>कुर्यात्स्वेव ॥ ६ ॥<br>पुनस्तोमेन यजेत पुनस्सवनमायन्तीति विज्ञायते ॥ ७ ॥ | न हि कर्म क्षीयत इति ॥ ५ ॥<br>कुर्यादित्यपरम् ॥ ६ ॥<br>पुनः स्तोमेनेष्ट्वा पुनः सवनमायान्तीति विज्ञायते ॥ ७ ॥ |
| सर्वं पाप्मानं तरति, तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजत इति ॥ ८ ॥<br>अग्निष्टुता वाऽभिशस्यमानो यजेतेति च ॥ ९ ॥ | तरति सर्वं पाप्मानं तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजते ॥ ९ ॥<br>अग्निष्टुतामभिशस्यमानं याजयेदिति च ॥ |
| तस्य निष्क्रयणानि जपस्तपो होम उपवास दानम् ॥ १० ॥ | तस्य निष्क्रयणानि जपस्तपो होम उपवासो दानम् ॥ ११ ॥ |
| उपनिषदो वेदादयो वेदान्ताः सर्वच्छन्दस्सु संहिता मधून्यघमर्पणमथर्वशिरसो रुद्राः पुरुषसूक्तं महादिवाकीर्त्यं ज्येष्ठसाम्नामन्यतमं बर्हिष्यवमानं कूष्माण्ड्यः पावमान्यः सावित्री चेति पावनानि ॥११॥ | उपनिषदो वेदान्तः सर्वच्छन्दस्सु... कूष्माण्डानि...चेति पावनानि ॥ १२ ॥ |