बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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बौधायनधर्मसूत्र का रचना-काल
बौधायनधर्मसूत्र निश्चित रूप से गौतमधर्मसूत्र के बाद की रचना है। गौतम के नाम का दो बार उल्लेख तो हुआ ही है उनके धर्मसूत्र के कई सूत्रों को भी बौधायन ने अपने धर्मसूत्र में ग्रहण कर लिया है। आपस्तम्ब और बौधायनधर्मसूत्रों में भी कई स्थानों पर समानता दिखायी पड़ती है। किन्तु यह निर्णय करना कठिन है कि किस धर्मसूत्र ने किससे उद्धरण लिये हैं, क्योंकि यह भी सम्भव है कि बौधायन और आपस्तम्ब ने एक ही स्रोत से इन सूत्रों को ग्रहण किया हो। बौधायन ने कतिपय सूत्रों में जो आपस्तम्ब में भी मिलते हैं 'इति' लगाकर स्पष्टतः उनके उद्धृत होने का संकेत किया है। इससे यह भी प्रतीत होता है कि बौधायन ने ये उद्धरण आपस्तम्ब से ही लिये हों। ब्यूह्लर ने इन समानताओं के आधार पर बौधायन को आपस्तम्ब से पूर्ववर्ती माना है। उनका तर्क यह है कि आपस्तम्ब द्वारा प्रतिपादित मत बौधायन के मतों की अपेक्षा बाद के समय के हैं। आपस्तम्ब ने बौधायन के मतों की आलोचना भी की है। दूसरी ओर आपस्तम्ब को बौधायन से पूर्ववर्ती मानने के पक्ष में भी विद्वानों ने कुछ तर्क प्रस्तुत किये हैं, यथा भाषा और शैली की दृष्टि से आपस्तम्बधर्मसूत्र अधिक अव्यवस्थित है। इसमें शब्दों का प्रयोग भी पुराने अर्थों में किया गया है। महामहोपाध्याय काणे ने इसी तथ्य की ओर निम्नलिखित पंक्तियों में संकेत किया है "यह बात कही जा सकती है कि बौधायन, वसिष्ठ एवं मनु ने किसी एक ही ग्रन्थ से ये बातें ली हों या कालान्तर में इन ग्रन्थों में ये बातें क्षेपक रूप में आ गयी हों। किन्तु क्षेपक छोटा हुआ करता है और यहाँ जो बातें या उद्धरण सम्मिलित हैं, वे बहुत लम्बे-लम्बे हैं।" सामान्यतः बौधायनधर्मसूत्र का समय ई० पू० २००-५०० के बीच माना गया है। ब्यूह्लर ने बौधायनधर्मसूत्र को आपस्तम्ब की अपेक्षा लगभग २०० वर्ष पहले का माना है। यह भी सम्भव है कि ये दोनों रचनाएँ समकालीन हों।
व्याख्याकार गोविन्दस्वामी
बौधायनधर्मसूत्र के व्याख्याकार गोविन्दस्वामी हैं। गोविन्दस्वामी की व्याख्याओं में अनेक स्मृतियों के उद्धरण आये हैं। इससे उनकी विद्वत्ता का स्पष्ट आभास मिलता है। उन्होंने शातातप, शङ्खलिखित महाभाष्य गृत्समद, योगसूत्र, शाबरभाष्य तथा भगवद्गीता से भी उद्धरण दिये हैं। उपनिषदों के अतिरिक्त श्रौतसूत्रों के भी उद्धरण इनके भाष्य में आये हैं। उन्हें सम्पूर्ण धर्मशास्त्र-साहित्य का ज्ञान है। अपनी व्याख्या में उन्होंने सूत्रों में उद्धृत मन्त्रों के सन्दर्भ का भी निर्देश दिया है। प्रस्तुत विषयों पर दूसरे धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों पर के जो उद्धरण उन्होंने दिये हैं, उससे धर्मशास्त्र के तुलनात्मक अध्ययन की दृष्टि से उनकी व्याख्या का महत्त्व और बढ़ गया है।
बौधायनधर्मसूत्र के संस्करण
सर्वप्रथम १८८४ ई० में डॉ० हूत्स ने लाइपत्सिंग से बौधायनधर्मसूत्र प्रकाशित किया। मैसूर से इसका एक संस्करण १९०७ ई० में प्रकाशित हुआ। इस संस्करण में गोविन्दस्वामी की 'विवरण' नाम की टीका का समावेश है। इसका अँग्रेजी अनुवाद ब्यूह्लर ने किया है, जो सेक्रेड बुक्स ऑफ दि ईस्ट सीरिज भाग-१४ में प्रकाशित है।