बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in contextचतुर्थः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः १९९
साम्प्रतं देवरनियोगे अनर्हा आह—
अथाऽप्युदाहरन्ति—
वशा चोत्पन्नपुत्रा च नीरजस्का गतप्रजा ।
नाऽकामा सन्नियोज्या स्यात् फलं यस्यां न विद्यत इति ॥१०॥
अनु०—इस संबन्ध में धर्मशास्त्रज्ञ निम्नलिखित पद्य उद्धृत करते हैं—
जो विधवा स्त्री वन्ध्या हो, जिसके पुत्र उत्पन्न हो चुके हैं, जिसके पुत्र गर्भ का स्राव हो जाता हो, जिसके बच्चे मर गये हों, जो पुत्र उत्पन्न करने के लिए इच्छुक न हो, जिस स्त्री से संबन्ध का कोई फल न होने वाला हो उससे प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए ॥ १० ॥
या पुरुषसम्बन्धं नेच्छति । यस्यामुपगमनफलं न विद्यते गर्भस्य स्रवणात् ॥ १० ॥
अन्यत्राऽपि देवरनियोगादगम्या आह—
मातुलपितृष्वसा भगिनी भागिनेयी स्नुषा मातुलानी सखिवधू-
रित्यगम्याः ॥ ११ ॥
अनु०—मामा की बहन, पिता की बहन, अपनी बहन, बहन की पुत्री, पुत्रवधू मामी तथा मित्र की पत्नी—ये स्त्रियां अगम्य होती हैं ॥ ११ ॥
स्वसृशब्दो मातुलपितृशब्दाभ्यां प्रत्येकं सम्बध्यते । भगिनी सोदरी । स्नुषा पुत्रस्य भार्या । मातुलानी मातुलस्य पत्नी । सखीवधूः सख्युश्च भार्या ॥ ११ ॥
अगम्यानां गमने कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ चान्द्रायणमिति प्रायश्चित्तिः ॥१२॥
अनु०—अगम्या स्त्रियों के गमन पर कृच्छ्र, अतिकृच्छ्र और चान्द्रायण व्रत का प्रायश्चित्त होता है ॥ १२ ॥
टि०—जैसा कि गोविन्दस्वामी ने व्याख्या में स्पष्ट किया है ये प्रायश्चित्त अमतिपूर्वक गमन करने पर ही होते हैं ।
अमतिपूर्वं गमन एतद् द्रष्टव्यम् । ये पुनर्मातुलस्य दुहितरं पितृष्वसुश्च मन्त्रेण संस्कृत्य बन्धुसमक्षं तस्यामेव पुत्रानुत्पादयन्ति चरन्ति च धर्मं तया सह, तेषां निष्कृतिं देवाः प्रष्टव्याः ॥ १२ ॥
एतेन चण्डालोभ्यवायो व्याख्यातः ॥ १३ ॥