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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

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DevanagariHindipublished486 pages

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कारण वह व्यक्ति के जीवन को व्यवस्थित एवं संयमित करने के लिए सदैव तत्पर है। मानवजीवन की छोटी-से-छोटी समस्या पर भी यह धर्म विचार करता है, व्यवस्था देता है, मार्ग का निर्देश करता है और उसके बाद भी व्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन नहीं करता। सब कुछ कहने पर भी वह बड़ी उदारता से कहता है--तुम अपनी आत्मा से पूछो यदि वह तुम्हें स्वकल्याण का मार्ग सुझाता है तो उसी का अनुसरण करो। उसका सन्देश है "आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।" आत्मा का अनादर कहीं भी अभीष्ट नहीं है और इसीलिए धर्मसूत्रों में आत्मरक्षा और आत्मसम्मान के लिए बार-बार उद्बोधित किया गया है। हिन्दूधर्म धर्म का स्रोत वेद और स्मृति के अतिरिक्त "स्वस्य च प्रियमात्मनः" अथवा मनु के शब्दों में "आत्मनस्तुष्टिरेव च" भी मानता है।

जीवन के प्रत्येक पक्ष तथा प्रत्येक समस्या पर जिस प्रकार हिन्दू धर्म में विचार किया गया है वह विदेशी चिन्तकों को भी आश्चर्य में डाल देता है। माक्सम्यूल्लेर ने भारतीय संस्कृति की इन विशेषताओं के विषय में लिखा है—

"If I were asked under what sky the human mind has fully developed some of its choicest gifts, has most deeply pondered on the greatest problems of life, and has found solutions of some of them which well deserve the attention even of those who have studied Plato and Kant—I should point to India."
—What Can India Teach us ? p. 6.

(यदि मुझसे यह पूछा जाये कि किस देश में मानव मस्तिष्क ने अपने श्रेष्ठ उपहारों का पूर्ण विकास किया है, जीवन की जटिलतम समस्याओं पर गम्भीरता से विचार किया है और प्लेटो तथा काण्ट के दर्शन का अध्ययन करने वालों के भी चिन्तन को आकृष्ट करने वाली कतिपय समस्याओं के समाधान ढूँढे हैं, तो मैं भारत की ओर संकेत करूँगा।)

भारतीय धर्म का मूल आधार आचार है। धर्मसूत्रों में आचार को ही प्रधानता दी गयी है। हिन्दू समाज का निर्माण आचार के आधार पर ही हुआ है। समाज तथा व्यक्ति की समुन्नति आचार की रक्षा से ही सम्भव है और भारतीय संस्कृति के इतिहास में जब तक आचार को प्राधान्य मिलता रहा, तब तक धर्म अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल बना रहा और समाज में सहिष्णुता, दया, दान, सद्भावना, प्रेम आदि महान् मानवीय गुण मनुष्य को शान्ति और लोककल्याण की पवित्र भावनाओं से प्रेरित करते रहे। जैसे-जैसे आचार की उपेक्षा होती गयी वैसे-वैसे अशान्ति हिंसा और अकल्याण अपना प्रभाव पसारते गये। हमारे सांस्कृतिक इतिहास के उत्थान और पतन की यही संक्षिप्त कहानी है। धर्म का व्यावहारिक पक्ष होने के कारण ही आचाररहित व्यक्ति इस लोक तथा परलोक में विनाश का ही भागी होता है। वसिष्ठधर्मसूत्र के शब्दों में—

"आचारः परमो धर्मः सर्वेषामिति निश्चयः।
हीनाचारपरीतात्मा प्रेत्य चेह च नश्यति॥"—वसिष्ठधर्मसूत्र १।१

वेद या शास्त्र में पारंगत व्यक्ति भी यदि आचार से भ्रष्ट है तो उसका सम्पूर्ण धर्मज्ञान उसे कोई लाभ नहीं पहुँचा सकता, जैसे अन्धे के हृदय में उसकी सुन्दर पत्नी भी सौन्दर्यानुभूति का कोई सुख नहीं उत्पन्न करती—