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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

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DevanagariHindipublished486 pages

Page 22 of 486

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Page 22

[ १८ ]

अपि तु वास्तविक जीवन की यथार्थ अनुभूति है। इसी पारलौकिक स्पृहा को कवि वर्ड्स वर्थ ने इन शब्दों में व्यक्त किया है—

“Those obstinate questionings
Of sense and outward things
Falling form us, vanishings,
Blank misgivings of a creature
Moving about in worlds not realised.”

यह आध्यात्मिक जागरण या आस्था आज के जगत् की प्राथमिक आवश्यकता बन गयी है “जगत् का और मानव इतिहास का एकमात्र वास्तविक एवं गम्भीर चिन्तन का विषय है आस्था और अनास्था का संघर्ष। दूसरे सभी विषय इसके अधीन ही हैं।” इस आस्था के अभाव में थोड़ी देर के लिए वैभव की चकाचौंध और झूठी गरिमा प्राप्त हो सकती है लेकिन वह शीघ्र ही समय के प्रवाह में विलीन हो जाती है। मानव आस्था के सहारे जीता है और आस्था के अभाव में मर जाता है। समाज भी आस्था से जीवित रहता है और आस्था के लोप होने पर उसका विनाश हो जाता है।

यह आस्था ही भारतीय धर्म का आध्यात्मिक पक्ष है। यह आध्यात्मिकता भारतीय चरित्र की ऐसी विशेषता है, जिसने हमारी संस्कृति को अमरता प्रदान की है। इस आध्यात्मिकता का उल्लेख प्रो० माक्स म्यूहलेर ने बड़े स्पष्ट शब्दों में किया है—

“यदि मुझसे एक शब्द में भारतीय चरित्र की विशेषता बताने को कहा जाय तो मैं यही कहूँगा कि वह पारलौकिक था। —भारतीय चरित्र में इस पारलौकिक मनोवृत्ति ने अन्य किसी देश की अपेक्षा अधिक प्राधान्य प्राप्त किया।”

<p align="right">—ह्वाट कैन इण्डिया टीच अस, पृ० १०४, १०५।</p>

भारतीय धर्म की यह विशेषता है कि वह दर्शन के सिद्धान्तों से पृथक् नहीं है। वस्तुतः, धर्म और दर्शन एक सिक्के के दो पहलू बन गये हैं। यह सत्य है कि धर्म में आस्था और भावना प्रधान होती है जब कि दर्शन में विचार और तर्क। धर्मसूत्रों में भी धर्म और दर्शन का यह घनिष्ठ सम्बन्ध सर्वत्र बना हुआ है। दार्शनिक सिद्धान्त व्यक्ति के व्यावहारिक जीवन को पूर्णतः अभिव्याप्त करता है। भारतीय धर्म का मूल आधार आचार है। इसकी नींव गहरी है और उसके कुछ मौलिक तत्त्व हैं जो इसे स्थायित्व प्रदान करते हैं। एक पाश्चात्य आलोचक ने भारतीय धर्म के इन्हीं तत्त्वों की ओर स्पष्टतः संकेत किया है—“भारत का आध्यात्मिक इतिहास उसके अत्यन्त मौलिक विचार के घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है और यह बात सोची भी नहीं जा सकती कि इस प्रकार की संस्कृति जो हजारों वर्षों से भारत में फूलती-फलती रही है, इतनी गहरी जड़ों पर आधारित होती और स्वयं को इतनी दृढ़ता से बनाये रखती, अगर इसमें महान् एवं चिरस्थायी मूल्य वाले तत्त्व निहित न होते।”

भारतीय धर्म ने मानव के महत्व को पहचाना है, मनुष्य की उपयोगिता को समझा है और इस कारण उसका प्रधान लक्ष्य है जीवन के प्रत्येक क्षण का अपने और दूसरों के कल्याण के लिए उपयोग। पलायनवादिता हिन्दू धर्म की आत्मा से बिल्कुल अपरिचित है। हिन्दू धर्म ने मनुष्य में असीम शक्तियाँ और अनन्त सम्भावनाएँ देखी हैं। इस