बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in contextसमर्थन करने वाला शास्त्र "कल्प्यते समर्थ्यते यागप्रयोगोऽत्र ।" कल्प के अन्तर्गत सूत्रों का विशाल भण्डार समाहित है। कल्पसूत्रों के महत्त्व के विषय में प्रो० मैक्स म्यूलेर ने ठीक ही कहा है—"कल्पसूत्रों का वैदिक साहित्य के इतिहास में अनेक कारणों से महत्त्व है। वे न केवल साहित्य के एक नये युग के द्योतक हैं और भारत के साहित्यिक एवं धार्मिक जीवन के नये प्रयोजन के सूचक हैं, अपितु उन्होंने अनेक ब्राह्मणों के लोप में योग दिया, जिनका अब केवल नाम ही ज्ञात है। यज्ञ का सम्पादन केवल वेद द्वारा, केवल कल्पसूत्र द्वारा ही हो सकता था किन्तु बिना सूत्रों की सहायता के ब्राह्मण या वेद के याज्ञिक विधान का ज्ञान पाना कठिन ही नहीं, असम्भव था।"
कल्पसूत्र के महत्त्व के विषय में कुमारिल का कथन है—
'वेदादृतेऽपि कुर्वन्ति कल्पैः कर्माणि याज्ञिकाः।
न तु कल्पैर्विना केचिन्मन्त्रब्राह्मणमात्रकात् ॥'
ये कल्पसूत्र प्रत्येक शाखा के लिए भिन्न-भिन्न होते थे, जैसा कि हिरण्यकेशिसूत्र की टीका में महादेव ने लिखा है—
"तन्न कल्पसूत्रं प्रतिशाखं भिन्नमभिन्नमपि क्वचित् शाखाभेदेऽप्यध्ययनभेदाद्वा सूत्र-भेदाद्वा। आश्वलायनीयं कात्यायनीयं च सूत्रं हि भिन्नाध्ययनयोर्द्वयोर्द्वयोः शाखयोरेकैक-मेव। तैत्तिरीयके च समाम्नाये समानाध्ययने नाना सूत्राणि। अनेन च सूत्रभेदे शाखाभेदः शाखाभेदे च सूत्रभेद इति परस्पराश्रय इति वाच्यम्।"
कल्पसूत्रों का विभाजन चार भागों में किया गया है—
१—श्रौत सूत्र—जिनमें श्रौत अग्नि से किये जाने वाले यज्ञों का विवेचन है।
२—गृह्य सूत्र—गृह्य अग्नि में किये जाने वाले संस्कारों तथा घरेलू यज्ञ-क्रियाओं का विवेचन करने वाले सूत्र।
३—धर्मसूत्र—आश्रमों तथा वर्णों के कर्त्तव्य, व्यक्ति के आचरण के नियम, प्रायश्चित्त, राजा के कर्त्तव्य, अपराध और दण्ड का विधान करने वाले सूत्र।
४—शुल्बसूत्र—यज्ञ की वेदी आदि के निर्माण की विधि का विवेचन करने वाले सूत्र।
धर्मसूत्रों की परम्परा
धर्मसूत्र कल्पवेदाङ्ग-साहित्य की परम्परा में आते हैं। जैसा कि विष्णुमित्र ने ऋग्वेद-प्रातिशाख्य की वर्गद्वयवृत्ति में कल्प की परिभाषा की है, कल्प वेद में विहित कर्मों की क्रमपूर्वक व्यवस्थित कल्पना करने वाला शास्त्र है "कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्।"
धर्मसूत्र भी अन्य ग्रन्थों के समान भिन्न-भिन्न शाखा में पृथक्-पृथक् थे। किन्तु कतिपय धर्मसूत्र ही इस समय उपलब्ध हैं। धर्मसूत्रों का श्रौत एवं गृह्यसूत्रों से भी अटूट सम्बन्ध है। जिन शाखाओं के सभी कल्पसूत्र उपलब्ध हैं उनमें प्रमुख हैं बौधायन, आपस्तम्ब और हिरण्यकेशि। ऐसा प्रतीत होता है कि कई शाखाओं में धर्मसूत्र अलग नहीं होते थे और वे शाखायें किसी प्रमुख शाखा के धर्मसूत्र को अपना लेती थीं। विभिन्न शाखाओं में एक अद्भुत सहिष्णुता थी जिसके परिणामस्वरूप
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