आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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आयुर्वेद-दर्शन
जिस अपर ओज के कारण शरीरावयव तृप्त होकर प्राणी जीवित रहते हैं; जो धातुरस का सारभूत पदार्थ ( पोषक द्रव्य, Protein ) है; ( प्रायः इसी हेतु धातु-रस को भी ' रसश्वैजः संख्यातः ' इस तरह ओज कहने की प्रथासी पड गई ) जिसमें प्राणों ( सत्व, शरीर, आत्मा अथवा सत्व रज तम वायु अग्नि सोम और आत्मा ) का वास्तव्य रहता है और जिसके बिना प्राणियों का जीवित रह नहीं सकता उसको ओजोवहा ( धमनियाँ ) शरीर में चारों ओर पहुंचाती हैं।
यह अन्न से प्राप्त होता है और इसी की विशुद्ध अवस्था को पर ओज कहते हैं।
ओज के उक्त विवेचन में उसके सामान्यतः तीन कार्यों का उल्लेख है; शरीर को तृप्त करना, प्राणों के संयोग को धारण करना अर्थात ही ' संबद्ध ' करना और उस संयोग को बनाये रखना अर्थात जीवन को कायम रखना। तदनुसार क्षीणौजस् पुरुष के लक्षणों के विषय में यह कहा गया है कि:-
बिभेति दुर्बलोऽभीक्षणं ध्यायति न्यथितेन्द्रियः ।
दुच्छायो दुर्भना रुक्षः क्षामश्चैवोजसः क्षये ॥
( च. सू. अ. १७ )
इस पर से यह ज्ञात होगा कि ओज का मुख्य कार्य 'संबंध-विधान' है चाहे फिर वह अवयवों का हो अथवा प्राणों का।