आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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Read in contextवायोर्विद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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इसका जो हृदयस्थ अंश है वह सत्व, शरीर व आत्मा के संयोग को धारण करता है। अतः इसके नाश से जीवित ही नष्ट होजाता है।
प्रथमे जायते ह्योजः शरीरेऽस्मिन् शरीरिणाम् ।
सर्विर्वेणं मधुरसं लाजगंधि प्रजायते ॥ (च. सू. अ. १७)
प्राणियों के प्रथम शरीर में अर्थात् 'गर्भाकुर' में यह ची के सहस्र, मीठा, और धान के लावा के सहस्र गंधवाला रहता है। किंतु
हृदि तिष्ठति यच्छुद्धं रक्तभीषत्सपीतकम् ।
आजः शरीरं संख्यातं तन्नाशान्ना विनश्यति ॥
(च. सू. अ. १७)
जो पर आज हृदय में रहता है और जिसके नाश से जीवित नष्ट होता है वह सुरखी मायल पीला रहता है।
(३) अपर ओजः— इसके विषय में यह कहा गया है किः—
आजोचहा शरीरेऽस्मिन् विधम्यंते समंततः ।
येनौजसा वर्तयति ग्रीणिताः सर्वजंतवः ॥
यत् शरीरं रस स्नेहः प्राणायत्र प्रतिष्ठिताः ।
यं दत्ते सर्व भूतानां जीवितं नावतिष्ठते ॥
(च. सू. अ. ३०)
१ इन अंशों को हमने जानबूझ कर आगे पीछे किया है।