Skip to content
SarvaKosh
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

Page 65 of 235

Read in context
Page 65

वार्माविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

४३

ख्येयो भवति, विकल्पभेदापरिसंख्येयत्वात्' (च. वि. अ. १) और गुर्वादि गुणप्रधानता वादी कहते थे कि:—

‘धातवः पुनः शरीराः समान् गुणैः समान गुणभूषिष्टैर्वाप्याहारविहारैरभ्यस्यमानैर्गुडि प्राप्नुवन्ति, ह्यासंतु विपरीत गुणैर्विपरीतगुणभूषिष्टैर्वाप्याहारविहारैरभ्यस्यमानैः । तत्र इमे शरीरधातु गुणाः संख्या सामर्थ्य रूप कर्तारः । तद्यथा-गुरु लघु शीतोष्ण स्निग्ध रूक्ष मंद तीक्ष्ण स्थिर सर मृदु कठिन विषद पिच्छिल श्लक्ष्ण खर सूक्ष्म स्थूल सांद्र द्रवोः । तेषु ये

१ इसका अर्थ यह है कि गुर्वादिगुणसंबन्ध गुणप्रसादाख्य-धातु ही रसादि श्रुकांत धातुओं के घटक अथवा उत्पादक हैं (परिणामतत्त्वाहारगुणाः शरीरगुण भावमापद्येते) । क्योंकि इनके वैविध्य (संख्या) पर उनका वैविध्य, इनके सामर्थ्य पर उनका सामर्थ्य (कार्य) और इनकी आकृति पर उनकी आकृति अवलंबित है । सुश्रुतसंहिता में भी यह कहा गया है कि:—‘गुणा य उक्ता द्रव्येषु शरीरेष्वपि ते तथा । खानहृद्विक्षयास्तस्माद् द्रव्याणां द्रव्यहेतुकाः’ (सु. सू. अ. ४२)

२ सुश्रुत संहिता में गुर्वादिगुणों का विवेचन इस प्रकार है:—
अतऊध्वे प्रवक्ष्यामि गुणानां कर्मे विस्तरम् ।
कर्माभिस्तनुमीयते नाना द्रव्याश्रया गुणाः ॥
ल्हादनःस्तंभनःशीतो मूच्छांतुट् स्वेद दाहाजित् ।
ऊष्णस्तीद्रिपरीतैः स्यात्वाचनश्च विशेषतः ॥
स्नेहमार्दवकृत् स्निग्धो बलवर्ण करस्तथा ।
सूक्ष्मस्तद्विपरीतस्याद्विशेषास्तंभनः खरः ॥