आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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आयुर्वेद सूक्ष्म
रंजक पित्तः—इसके विषय में यह कहा गया है कि 'यत्तु यकृत-
प्लीहोः पित्तं तस्मिन् रंजकोऽग्निरिति संज्ञा, स रसस्य रागकृद्भुक्तः' ।
(सु. सू. अ. २१) अर्थात् रंजकपित्त, यकृत और प्लीहा में रहता
है। यह रस को रंगता है। इस रंजन के विषय में यह कहा गया है
कि 'आहारस्य यस्तेजोभूतः सारः परमसूक्ष्मः स 'रस' इत्युच्यते।
तस्य च द्रव्यं स्थानम्। स खल्वाप्यो रसो यकृतप्लीहानो प्राप्य राग-
मुपैति। रंजिता स्तेजसात्वापः शरीरस्थेन देहिनाम् । अन्वापन्नाः
प्रसन्नेन रक्तमित्यभिधीयते' । (सु. सू. अ. १३) इत्यादि।
उक्त विधान में यद्यपि रंजकपित्त के द्वारा रसरंजन ही बत-
लाया है तथापि मारीचि के कथन के अनुसार शरीर के भिन्न २ वर्ण
भी इसी के कारण हैं।
यकृत में याकृत जीवाणुओं के बीच में से 'पित्त केशिका'ओं
(Bile Capillaries) की केशिकाओं शाखा प्रशाखाएँ फैली हुई हैं।
उक्त केशिकाएँ इतनी सूक्ष्म हैं कि उनमें एक रक्त कण का भी प्रवेश
होना असंभव है। अतः इनमें सिर्फ आययरस (रक्तवारी) रहता है।
याकृत जीवाणु, इस आययरस से अपेक्षित अंश को लेकर उससे याकृत
पित्त, पैचिक स्नान और रंजक पित्त तैयार करते हैं।
शुद्ध रंजक पित्त के दो प्रकार हैं; (१) रक्तरंजक पित्त और
(२) दयावरंजक पित्त। दोनों में भिन्न वायु [प्राण द्रव्य] रहता है
पर पहिले की अपेक्षा दूसरे में अधिक रहता है। रक्तरंजक पित्त
(Billi Rubin) से शरीर में पीला, सुनहरा, नारंगी, और लाल रंग
रहते हैं। दयावरंजक पित्त (Billi Verdin) से नीला व हरा रंग रहता