आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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शर्करा बहुत शीघ्र बनती है। अत्रत्य वसापाचक से वसा का क्षीरी-भवन होकर वसाम्ल और वसामधु बनते हैं। दधुपादक से दूध का दही बनता है। क्लौम पाचकपित्त, क्षारकल्प और अन्नकोथ कारक है।
(५) श्रुद्रांत्रस्थ पाचकपित्तः—यह श्रुद्रांत्रगत सोममंडलमध्यस्थ सूर्यमंडलों से पैदा होता है। इसमें परिवर्तक संज्ञक अभिषूत रहते हैं। इनके द्वारा इक्षुशर्करा का मधुशर्करामें व फलशर्करा में परिवर्तन होता है। यह पित्त, मांसल द्रव्य के पाचन में क्लौम पित्त का सहायक है। केवल क्लौम पित्त में अथवा केवल इस पित्त में पोषक द्रव्यों के पाचन का उत्तना सामर्थ्य नहीं है जितना कि दोनों के मिश्रण में है। इस पित्त से वसा की अपेक्षा पोषक द्रव्य के पाचन का धर्म अधिक है। उक्त मिश्रण इतना तेज है कि खाली पेट में यह आंतों में सूजन पैदा करता है।
श्रुद्रांत्र में अभिषूतों के द्वारा पिष्ट का दुर्धाम्ल तथा उससे ‘अंगारद्विमित्र,’ Corbon-di-oxide ‘उज्जन’ और ‘नवनीताम्ल’ बनता है। पैंछी भुस्सी का पृथक्करण होता है। अंगारद्विमित्र के पैदा होने पर पेट में अनेक वायवीय द्रव्य [ कठु प्रपाकजन्य वायु ] पैदा होते हैं। इनकी वानस्पत्य अन्न से अधिक पैदाहृष होती है। वसा का क्षीरीभवन होता है और उससे वसाम्ल बनते हैं। पोषक द्रव्य से मांसघटक द्रव्य तथा पोषकाम्ल बनते हैं। इन अभिषूतों के द्वारा जब पोषक द्रव्यों का पाचन होता रहता है तब अत्यंत दुर्गीध युक्त वायु पैदा होते हैं। श्रुद्रांत्रस्थ अन्न का ‘कोथ’ भी पाचन में सहायक है और पाचन के समय में जो क्षारकल्प विषं पैदा होते हैं उनका प्रत्यनीक है।