अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextउसी का मांस भक्षण करो. (७)
भरूजि पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनीः.
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त.. (८)
हे शरीर का अपहरण करने हेतु आने वाली राक्षसी! तुम ने हमारी ओर दरिद्रता प्रदान
करने वाली जो राक्षसियां भेजी हैं, वे हमारी ओर से लौट जाएं. तुम्हारे जो आयुध हैं, वे भी
लौट जाएं. तुम्हारे अनुचर चोर भी चले जाएं. तुम हमारे जिस शत्रु की हो, उसी के पास
वापस लौट जाओ तथा उसे खा डालो. जिस प्रयोग करने वाले ने तुम्हें मेरे पास भेजा है, तुम
उसी को खा डालो. तुम उसी का मांस भक्षण करो. (८)
सूक्त-२५ देवता—पृश्निपर्णी
शं नो देवी पृश्निपर्ण्यशं निर्ऋत्या अकः.
उग्रा हि कण्वजम्भनी तामभक्षि सहस्वतीम्.. (१)
चमकती हुई पृश्निपर्णी नाम की जड़ीबूटी हमें सुख प्रदान करे तथा रोग उत्पन्न करने
वाली पाप देवता निर्ऋति को दुःख दे. मैं ने अत्यधिक शक्तिशाली, पापनाशिनी एवं रोग को
पराजित करने वाली जड़ी पृश्निपर्णी को खाया है. (१)
सहमानेयं प्रथमा पृश्निपर्ण्यजायत.
तयाहं दुर्नाम्नां शिरो वृश्चामि शकुनेरिव.. (२)
रोगों को पराजित करने वाली पृश्निपर्णी सभी जड़ीबूटियों में प्रमुख बन कर उत्पन्न हुई
है. इस के द्वारा मैं दाद, खुजली, कोढ़ आदि रोगों के कारण को इस प्रकार समाप्त करता हूं,
जिस प्रकार खड्ग से पक्षी का सिर काटा जाता है. (२)
अरायमस्कृग्वावानं यश्च स्फातिं जिहीर्षति.
गर्भादं कण्वं नाशय पृश्निपर्णि सहस्व च.. (३)
हे पृश्निपर्णी नामक जड़ी! मेरे शरीर के रक्त को गिराने वाले कुष्ठ आदि रोगों को, शरीर
वृद्धि को रोकने वाले संग्रहणी आदि रोगों को तथा गर्भ को नष्ट करने वाले रोग के उत्पादक
कण्व नामक पाप को नष्ट करो एवं मेरे शत्रुओं को पराजित करो. (३)
गिरिमेनाँ आ वेशय कण्वान् जीवितयोपनान्.
तांस्त्वं देवि पृश्निपर्ण्यग्निरिवानुदहन्निहि.. (४)
हे पृश्निपर्णी नाम की बूटी! प्राणों का नाश करने वाले एवं कुष्ठ आदि रोगों को उत्पन्न
करने वाले पाप कण्व को पर्वत की गुफा में घुसा दो. जिस प्रकार अग्नि वन में रहने वाले
पशुओं को जला देती है, उसी प्रकार तू पर्वत की गुफा में घुसे हुए पापों को जलाती हुई जा.
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